आज सुबह चलते-चलते पहुंच,
शहर की उस बस्ती के पास,
जहां सूरज आता तो पर,
उजाला नहीं करता,
यहां बच्चों खिलखिलाहट,
दब जाती है कूड़े के ढेर तले,
ये खेलते हैं तो कूड़े के साथ,
जीते हैं तो कूड़े के साथ,
एक दिन इसी कुड़े के साथ,
समाप्त हो जाती है इनकी इहलीला।
इस बस्ती में,
एक दृश्य उभरा,
जिसने अंकित किए कई सवाल,
मेरे मानस पटल पर,
सड़क के पास लगे कूड़े के ढेर मैं,
हुई कुछ हलचल,
मैने सोचा कोई जानवर होगा,
लेकिन यह सोच गलत थी,
मुंह पर कालिख लगा,
एक सात-आठ साल का बच्चा,
पीठ पर कूड़े का थैला लादकर निकला,
लगा कि वह जाएगा,
अपने घर की ओर,
वह देखने लगा,
एकटक स्कूल जाते बच्चों को,
उसके मासूम होठों पर,
हंसी बरस गई,
उन बच्चों को देखकर,
लगा कि उसके मन भी कुछ है,
वो भी जाना चाहता है स्कूल,
वह भी पढ़ना चाहता है,
वह भी जीना चाहता है,
खुशहाल जिंदगी,
लेकिन उसकी किस्मत,
या समाज की विषमता,
ने उसे कुड़े के ढेर में,
जिंदगी गुजरने को मजबूर किया,
जिन हाथों में कलम और किताब होनी चाहिए,
वह फिर से कूड़े के ढेर में,
अपना पेट भरने का सामान,
तलाशने लगे।
लेकिन हम मजबूर थे,
कुछ सोचने के लिए,
न जाने कितने बच्चे है,
इस देश में,
जिनके हंसने-हंसाने के दिन,
कूड़े के ढेर में दफ़न हो जाते हैं,
यही सोचते हुए,
उदास मन से मैं,
अपने घर पहुंचा,
जहां मेरे बच्चे,
तैयार बैठे थे घर जाने को।
बस आई वो चले गए,
पर मैं सोचता रहा,
पिंटू के बारे,
अरे पिंटू कौन,
वही जो मिला था,
सुबह कूड़े के ढेर के पास।
