आवारापन…

चौबारे पर,

किसी की पदचाप ने,

मेरी अंतस की शांति को,

भंग किया,

खो गया मैं,

यादों की असीम गहराई में,

बीते लम्‍हें ले गए हमें,

उन निर्जन हसीन वदियों में,

जहां मेरे और उसके सिवा,

कई और भी थे,

मादकता लिए हवा की हिलोंरे,

पेड़ों से गिरते सूखे पत्‍तों का सदेश,

गहरी, ठहरी झील,

कुछ चिडियों की चहचहाना,

इसके सिवा भी बहुत कुछ,

लेकिन मेरे साथ जो था,

वो इन सब की परवाह नहीं करता,

वो आवारा जो ठहरा,

अपनी मस्‍ती में रहता है,

झूमता है, गाता है,

कभी-कभी खुशी से,

नाच भी उठता है,

कभी आंसू गिराता है,

कभी जोर से चिल्‍लाता है,

कभी बच्‍चा बन,

कागज की नाव बनाता है

उस पर सवारी करना चाहता है,

झील की लहरों के साथ,

बहना चाहता है,

हवाओं की मादकता के साथ,

महकना चाहता है,

सूखे पत्‍तों को चबाकर,

भूख शांत करना चाह‍ता है,

वह मरने से पहले चिडियों के साथ,

जी भर जीना चाहता है,

वह सब कुछ पा लेना चाहता है,

अचानक ही बाबा ने आवाज लगा दी,

मैं और मेरा साथी,

बिछुड़ गए, सुबह मिलने का

पुन: वादा करके,

मेरा ‘आवारापन’, तब से आज तक

हर रोज मुझे गहरी नींद से जगाता है।

———————————————‍कुमार आदित्‍य

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