कभी कभी मन करता है…..

कभी कभी मन करता है,
समंदर किनारे तुम्‍हारे साथ,
निहारूं डूबते सूरज को,
गुजारूं तुम्‍हारे साथ,
लालिमा से भरी एक शाम,

फार्म हाऊस की सूनसान छत पर,
तेरे एहसास को जिऊं,
छुअन और आलिंगन की गवाह बने,
सितारें से भरी चांदनी रात,

सावन के बरसते बादलों मे,
तुम्‍हारे साथ भीगूं,
छप-छप करते हुए,
जियूं अपना बचपन,

कभी कभी मन करता है,
तेरा हाथ पकड़ कर करूं,
लम्‍बी दूरी तक यात्रा,
यूं ही गुजर जाए एक उम्र।————–आदित्‍य शुक्‍ला

मनभावन, सावन आयो रे…….

sawan

आयो रे आयो रे,

मनभावन, सावन आयो रे,
मनभावन, सावन आयो रे,

आयो रे आयो रे,

सखि गीत सु‍हावन गाओ रे,
मनभावन, सावन आयो रे,

कैसे गाऊं गीत सुहावन,
छोड़ गए हमका जब साजन,
अापन तो बस यही कहानी,
झर-झर आंख झरत है सावन,
मैं बिरहानी बिरह की मारी,
फिरत रहूं मैं मारी-मारी,
हो सूखो बीतो जाये सवनवा,
कैसे सुर लग जावे,

मन भावन सावन आयो रे,
सखि गीत सुहावन गाओ रे,

पिया हंसी मन ऐसे बासी,
कछु भी रास न आवे,
कौन देश जा बैठे सजनवा,
हो कोई संदेशा लावे,
लाख जतन कर हारी मैं तो,
रतियां नींद न आवे,
हो बैरी छुप-छुप नीर बहावे,
कैसे दिल बहलावे।

मन भावन सावन आयो रे,
सखि गीत सुहावन गाओ रे।

बागन-बागन मैं दुखियारी,
देखत हूं मैं राह तुहारी,
ताल के बरगद झूलन जाऊं,
तुम बिन कैसे पैंग बढ़ाऊं,
खो बैठी में सुध-बुध अपनी,
कछु भी रास न आवे,
हो साजन काहे मोह सतावे,
कौन काल तू आवे।

मन भावन सावन आयो रे,
सखि गीत सुहावन गाओ रे।

आयो रे आयो रे,

सखि गीत सु‍हावन गाओ रे,
मनभावन, सावन आयो रे।

मनभावन सावन आयो रे।——————आदित्‍य शुक्‍ला

By कुमार आदित्‍य Posted in गीत

तुम्‍हारी जरुरत

पतझड़ के साथ,
गिरते तेरी यादों के पत्‍तों,
मैं हर रोज लिखता हूं,
कुछ नया,
परंतु पीले होते इन पत्‍तों की,
हरितिमा को बचा नहीं पाता,
ये पत्‍तों कई दिनों से,
गिर रहे हैं लगातार,
तेरी यादों का पेड़,
बिना पत्‍तों के गंजा लगने लगा है,
एक दम सपाट गंजा,
अब तो तुमको आना ही होगा,
कुछ दिन यहां रहना,
इसकी देखभाल करना,
खाद-पानी देना,
जिससे नई कोपलों के साथ,
यादों का पेड़,
हो सके फिर से हरा-भरा,
लेकिन इस बार आना,
तो कभी वापस मत लौटना,
मैं देख नहीं सकता,
पर मेरी आंखों को हरियाली भाती है,
ठंडक पहुंचती है,
मेरे जे़हन में,
मेरी जिंदगी की हरितिमा को,
तुम्‍हारी जरुरत है।

(बिना आंखों के भी कभी-कभी……………………………….देखे जाते हैं निरुत्‍तर स्‍वप्‍न)