एक एहसास…

एक एहसास,

अनकहा सा,

अनसुना सा,

अनछुआ सा,

जैसे मन में

उठ रही हो

जल तंरग,

नदी के शांत जल में,

जैसे फेंका गया हो पत्‍थर,

मेरा काव्‍य,

मार रहा हो हिलोंरे,

चांद को देखकर,

समद में उठने वाले

ज्‍वार-भाटे की तरह,

शब्‍दों से परे,

निगुर्ण, नि:शब्‍द सा,

एक एहसास

बालों में रेंगती

उंगलियों सा,

चुबंन सा,

आलिंगन सा,

चेहरे पर छा रही,

घनघोर घटाओं सा,

बरसात के इंतजार सा,

एक एहसास,

अनकहा सा,

अनसुना सा।—–कुमार आदित्‍य

है कोई तो बात है…

तू साथ है, तू पास है, ये तेरा एहसास है,

जिस्‍म में मेरे चलती बस तेरी ही सांस है,

हो रहा दिल पर असर,

है कोई तो बात है…

खिल रही है हर कली, गा रहे हैं ये भंवर,

हर तरफ है छा रहा प्रेम का मंजर अमर,

लग रहा है तू बसंत की सौगात है,

है कोई तो बात है…

उलझनों में आ रहा जिंदगी का है मजा,

भीड़ में भी खोना चाहता है मन मेरा,

तू उजाला है मेरा और तू ही अंधेरी रात है,

है कोई तो बात है।

पर्वतों से बह रही शांत सी मधुरिम मलय,

गा रहें हैं गीत पंछी डूबकर होकर निलय,

प्रीत के ही गीत से गुनगुनाता प्रात है,

है कोई तो बात है।

प्‍यारा नीला रंग आज नभ पर छा रहा,

चांद को पाकर चकोरी गीत कोई गा रहा,

शांत तो हैं हम मगर, हो रही हर बात है,

है कोई तो बात है।

पतझड़ों के जाने का है समय अब आ गया,

चीरकर काले अंधेरों को उजाला छा गया,

पूर्णता का है पुट मिला, जो मिला तेरा साथ है,

है कोई तो बात है।

प्रकृति ने खोला बसंत का घूघंट निराला,

झूम रहा है ‘कवि’, काव्‍य का पीकर के प्‍याला,

प्रेयसी हर पंक्ति मेरी, शब्‍दों की बारात है,

है कोई तो बात है।

———————–कुमार आदित्‍य