झूठों की बस्‍ती में दम घुटता है …

सच कहने की हिम्‍मत करता रोज कोई मरता है,

सच तो यह है झूठों की बस्‍ती में दम घुटता है।।1।।

 

चेहरे पर आवरण लिए दिल से हैं काले लोग यहां,

काले हैं धंधे  इन सबके, काले इनके भोग यहां।

इनके हाथों में सत्‍ता की चाबी क्‍यों रखता है ?

सच कहने की हिम्‍मत करता रोज कोई मरता है,

सच तो यह है झूठों की बस्‍ती में दम घुटता है।।2।।

 

लूट रहे अपनी कुटिया को इनको इतना होश कहां,

डूबा रहे अपनी लुटिया इतने हैं मदहोश यहां,

फिर भी इनका भाग्‍य उदय हर क्षण क्‍यों होता है,

सच कहने की हिम्‍मत करता रोज कोई मरता है,

सच तो यह है झूठों की बस्‍ती में दम घुटता है।।3।।

 

इसां न इसांन रहा बन है बैठा हैवान यहां,

कोख में बेटी मारी जाती ऐसा है संविधान यहां,

दहेज की खातिर भी इस जग में रोज कोई जलता है,

सच कहने की हिम्‍मत करता रोज कोई मरता है,

सच तो यह है झूठों की बस्‍ती में दम घुटता है।।4।।

 

धन पाने  की खातिर पागल भाई-भाई को काट रहा,

मां-बाप निकाले जाते घर उनका कैसा पाप रहा,

रोज तंग गलियों में आकर कोई मर्डर करता है,

सच कहने की हिम्‍मत करता रोज कोई मरता है,

सच तो यह है झूठों की बस्‍ती में दम घुटता है।।5।।

 

है विकास झूठा ऐसा कि जिसमें प्रेम का नाम नहीं,

कितने भूखों मरते हैं पर गम का नमोनिशान नहीं,

बेचारी के दर्द तले पिस करके आहें भरता है,

सच कहने की हिम्‍मत करता रोज कोई मरता है,

सच तो यह है झूठों की बस्‍ती में दम घुटता है।।6।।

 

कब बदलेगा यह मंजर कब पाप से मुक्‍त धरा होगी,

कब जागेगा देश मेरा कब ताप से मुक्‍त धरा होगी,

बनकर पक्षी उड़ जाने को आकाश में मन करता है,

सच कहने की हिम्‍मत करता रोज कोई मरता है,

सच तो यह है झूठों की बस्‍ती में दम घुटता है।।7।।

 

तू है अनादि है दिगदिगंत फिर कैसे पाप धरा पर है,

तू है कराल है महाकाल फिर कैसे ताप धरा पर है,

ले विकट रूप क्‍यों तू इनके सर कलम नहीं करता है,

सच कहने की हिम्‍मत करता रोज कोई मरता है,

सच तो यह है झूठों की बस्‍ती में दम घुटता है।।8।।

————————————————कुमार आदित्‍य

नव चरित्र गढ़ना होगा …

सृजन सारथियों अब हम सबको ही आगे बढ़ना होगा।

कलम चलाकर इस युग में, फिर नवचरित्र गढ़ना होगा।

 

सोया है देवत्‍व धरा का, हमको उसे जगाना है,

हावी है असुरत्‍व मनुज पर, उसको हमें मिटाना है।

नवयुग के निर्माण हेतु, अब स्‍व चिंतन करना होगा,

कलम चलाकर इस युग में, फिर नवचरित्र गढ़ना होगा।। 1।।

 

डूबे थे अब तलक स्‍वार्थ में, जगत हेतु सोचा कब था,

खुद ही निष्‍प्राण रहे अब तक परित्राण हेतु सोचा कब था।

जब अवसर है मिला हमें, तो खुद आगे चलना होगा,

कलम चलाकर इस युग में फिर नवचरित्र गढ़ना होगा।। 2।।

महापर्व आया उस गुरू का, जिसने सब कुर्बान किया,

खुद विष पीकर उनने हमको, अमृत का रसपान दिया।

ऐसे गुरुवर के सपनों को, अब पूरा करना होगा,

कलम चलाकर इस युग में फिर नवचरित्र गढ़ना होगा।। 3।।

 

गुरुवर ने कलम चलाई थी, उज्‍ज्‍वल भविष्‍य को लाने को,

पुरुषार्थ किया जिनने जीवन भर, मानव को देव बनाने को।

उन गुरुवर की कलम थामकर, हमको अब लिखना होगा,

कलम चलाकर इस युग फिर, नव चरित्र गढ़ना होगा।। 4 ।।

 

थाम मशाल विचार क्रांति की, नई क्रांति लिख देगें जब,

दुष्‍प्रवत्ति सारी इस जग की, दूर कहीं भागेंगी तब।

जागेगा जन-जन इस जग का, नया जोश भरना होगा,

कलम चलाकर इस युग में फिर, नव चरित्र गढ़ना होगा।। 5।।