खुद से अनशन कर बैठा हूं,
आखिर मैं चुप क्यों बैठा हूं ?
दूर है मंजिल, राह कठिन है,
फिर क्यों में थककर बैठा हूं ?
जन्म लिया था, चाल थी पकड़ी,
संकल्प लिया था कुछ करने को,
मन ही मन उठ रहे द्वंद थे,
कुछ देकर जाऊंगा जग को,
अब होता आभास यही है,
क्या अपनी राहें भटका हूं,
दूर है मंजिल, राह कठिन है,
फिर क्यों मैं थककर बैठा हूं ?
अब मैने है मन में ठानी,
लिखूंगा में नई कहानी,
राहें नईं बनाऊंगा,
नई ज़वानी लाऊंगा,
जीत नए युग की लिखता हूं,
मैं खुद से अनशन करता हूं।
जिससे चलना थम ना जाए,
मन में मेरे भ्रम न आए,
गीत मेरे दुनिया ये गाए,
तभी निरंतर मैं चलता हूं,
हां खुद से अनशन करता हूं।
हां खुद से अनशन करता हूं।
