”रात और नींद”

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रात भी क्‍या खूब है,
आती है सुलाने के लिए,
पर कभी-कभी भूल जाती,
कि उसका धर्म क्‍या है,
शायद बचपना,
हां शायद बचपना सवार हो जाता होगा उस पर,
अक्‍सर रात खेलती है मेरे साथ,
खुद तो सोती नहीं,
और न ही मुझे देती है सोने,
बीती रात भी बार-बार,
मुझे जगाया रात ने,
कई बार चला ये जगने-जगाने का खेल,
नींद और रात ने दोस्‍ती कर ली,
जैसे ले लिया हो प्रण,
आज तो नहीं सोने दूंगी,
फिर मैंने भी कोशिशें करना,
कर दिया बंद,
जागती रात के बाद,
जब सुबह खिड़की से जागी,
तो नींद निगोड़ी,
आ धमकी,
ये कहने कि अब सो जाओ,
मेरी सहेली चली जो गई है,
मैने कहा अब सोने का वक्‍त कहां,
अब तो जाना है,
तैयारी जो करनी है,
आने वाली रात के स्‍वागत की।————–आदित्‍य शुक्‍ला

झूठों की बस्‍ती में दम घुटता है …

सच कहने की हिम्‍मत करता रोज कोई मरता है,

सच तो यह है झूठों की बस्‍ती में दम घुटता है।।1।।

 

चेहरे पर आवरण लिए दिल से हैं काले लोग यहां,

काले हैं धंधे  इन सबके, काले इनके भोग यहां।

इनके हाथों में सत्‍ता की चाबी क्‍यों रखता है ?

सच कहने की हिम्‍मत करता रोज कोई मरता है,

सच तो यह है झूठों की बस्‍ती में दम घुटता है।।2।।

 

लूट रहे अपनी कुटिया को इनको इतना होश कहां,

डूबा रहे अपनी लुटिया इतने हैं मदहोश यहां,

फिर भी इनका भाग्‍य उदय हर क्षण क्‍यों होता है,

सच कहने की हिम्‍मत करता रोज कोई मरता है,

सच तो यह है झूठों की बस्‍ती में दम घुटता है।।3।।

 

इसां न इसांन रहा बन है बैठा हैवान यहां,

कोख में बेटी मारी जाती ऐसा है संविधान यहां,

दहेज की खातिर भी इस जग में रोज कोई जलता है,

सच कहने की हिम्‍मत करता रोज कोई मरता है,

सच तो यह है झूठों की बस्‍ती में दम घुटता है।।4।।

 

धन पाने  की खातिर पागल भाई-भाई को काट रहा,

मां-बाप निकाले जाते घर उनका कैसा पाप रहा,

रोज तंग गलियों में आकर कोई मर्डर करता है,

सच कहने की हिम्‍मत करता रोज कोई मरता है,

सच तो यह है झूठों की बस्‍ती में दम घुटता है।।5।।

 

है विकास झूठा ऐसा कि जिसमें प्रेम का नाम नहीं,

कितने भूखों मरते हैं पर गम का नमोनिशान नहीं,

बेचारी के दर्द तले पिस करके आहें भरता है,

सच कहने की हिम्‍मत करता रोज कोई मरता है,

सच तो यह है झूठों की बस्‍ती में दम घुटता है।।6।।

 

कब बदलेगा यह मंजर कब पाप से मुक्‍त धरा होगी,

कब जागेगा देश मेरा कब ताप से मुक्‍त धरा होगी,

बनकर पक्षी उड़ जाने को आकाश में मन करता है,

सच कहने की हिम्‍मत करता रोज कोई मरता है,

सच तो यह है झूठों की बस्‍ती में दम घुटता है।।7।।

 

तू है अनादि है दिगदिगंत फिर कैसे पाप धरा पर है,

तू है कराल है महाकाल फिर कैसे ताप धरा पर है,

ले विकट रूप क्‍यों तू इनके सर कलम नहीं करता है,

सच कहने की हिम्‍मत करता रोज कोई मरता है,

सच तो यह है झूठों की बस्‍ती में दम घुटता है।।8।।

————————————————कुमार आदित्‍य