मुझे बिकना है…

मुझे बिकना है,

कोई खरीदेगा मुझे,

इस बाजार में,

जहां भावनाओं का मोल नहीं,

जहां प्‍यार की अहमियत न के बराबर,

जहां इंसानियत तो है ही नहीं,

अब तो बस मेरा शरीर ही है,

खरीद लो इसे,

मिल जाएंगे इसके मांस से कुछ पैसे,

जिससे भला हो जाएगा,

कुछ राष्‍ट्रवादियों का,

इसकी हड्डियों के चूरमे से मिट जाएगी,

कुछ गरीबों की भूख,

इस दुनिया की समस्‍याओं को

सुलझाने के लिए,

कोई खरीद लो मुझे,

बहुत आहत हूं मैं,

भ्रष्‍टाचार से,

महंगाई से,

किसान की मौतों से,

संसद की तौहीन से,

इसलिए मैं बिकना चाहता हूं,

शायद मेरे बिकने से,

सुधर जाएं इस देश के हालात,

कोई तो खरीदो मुझे,

मुझे बिकना,

अरे कोई तो बोली लगाओ!———-कुमार आदित्‍य

झूठों की बस्‍ती में दम घुटता है …

सच कहने की हिम्‍मत करता रोज कोई मरता है,

सच तो यह है झूठों की बस्‍ती में दम घुटता है।।1।।

 

चेहरे पर आवरण लिए दिल से हैं काले लोग यहां,

काले हैं धंधे  इन सबके, काले इनके भोग यहां।

इनके हाथों में सत्‍ता की चाबी क्‍यों रखता है ?

सच कहने की हिम्‍मत करता रोज कोई मरता है,

सच तो यह है झूठों की बस्‍ती में दम घुटता है।।2।।

 

लूट रहे अपनी कुटिया को इनको इतना होश कहां,

डूबा रहे अपनी लुटिया इतने हैं मदहोश यहां,

फिर भी इनका भाग्‍य उदय हर क्षण क्‍यों होता है,

सच कहने की हिम्‍मत करता रोज कोई मरता है,

सच तो यह है झूठों की बस्‍ती में दम घुटता है।।3।।

 

इसां न इसांन रहा बन है बैठा हैवान यहां,

कोख में बेटी मारी जाती ऐसा है संविधान यहां,

दहेज की खातिर भी इस जग में रोज कोई जलता है,

सच कहने की हिम्‍मत करता रोज कोई मरता है,

सच तो यह है झूठों की बस्‍ती में दम घुटता है।।4।।

 

धन पाने  की खातिर पागल भाई-भाई को काट रहा,

मां-बाप निकाले जाते घर उनका कैसा पाप रहा,

रोज तंग गलियों में आकर कोई मर्डर करता है,

सच कहने की हिम्‍मत करता रोज कोई मरता है,

सच तो यह है झूठों की बस्‍ती में दम घुटता है।।5।।

 

है विकास झूठा ऐसा कि जिसमें प्रेम का नाम नहीं,

कितने भूखों मरते हैं पर गम का नमोनिशान नहीं,

बेचारी के दर्द तले पिस करके आहें भरता है,

सच कहने की हिम्‍मत करता रोज कोई मरता है,

सच तो यह है झूठों की बस्‍ती में दम घुटता है।।6।।

 

कब बदलेगा यह मंजर कब पाप से मुक्‍त धरा होगी,

कब जागेगा देश मेरा कब ताप से मुक्‍त धरा होगी,

बनकर पक्षी उड़ जाने को आकाश में मन करता है,

सच कहने की हिम्‍मत करता रोज कोई मरता है,

सच तो यह है झूठों की बस्‍ती में दम घुटता है।।7।।

 

तू है अनादि है दिगदिगंत फिर कैसे पाप धरा पर है,

तू है कराल है महाकाल फिर कैसे ताप धरा पर है,

ले विकट रूप क्‍यों तू इनके सर कलम नहीं करता है,

सच कहने की हिम्‍मत करता रोज कोई मरता है,

सच तो यह है झूठों की बस्‍ती में दम घुटता है।।8।।

————————————————कुमार आदित्‍य