आखिर कब तक…

देखकर यूं भूख से मरते चमन को,

रो उठा है आज फिर से  दिल कोई।

धूं-धूं होकर जला रहा है घर किसी का,

मर रहा है भूख से फिर आज कोई।।1।।

रो रहा है फूल कोई पेट की इस आग में जल,

इस हृदय में चुभ रहा है शूल कोई।

मर रहे हैं अन्‍नदाता और नेता सो रहे हैं,

क्‍या हुई चुनने में हमसे भूल कोई।।2।।

सूखे मां के आचलों में फिर से भरना है उजाला,

लड़नी होगी फिर से हमको जंग कोई।

खोखली बातों से हरगिज न बनेगी बात अब,

लेना हमको आज होगा फिर नया संकल्‍प कोई।।3।।

चल चलें इस देश को फिर से सजाएं और संवारें,

भटके के लोगों को दिखाएं फिर अनोखी राह कोई।

कब तलक यूं ही चलेगा मौत का ये सिलसिला,

अब बनाना ही पड़ेगा फिर नया कानून कोई।।4।।

———————————————-कुमार आदित्‍य