लम्‍हें…

कभी याद बन चुभते लम्‍हें,

कभी मीत बन मिलते हैं।

कभी हार बन रोते लम्‍हें,

कभी जीत बन हंसते हैं।

वे लम्‍हें कितने प्‍यारे थे,

जिनमें था बचपन आया।

मिला पिता का प्‍यार हमें,

और माता ने दुलराया।

खेल-खेल में गुजरा बचपन,

और जवानी आ बैठी,

मिले हमें थे यार कई,

पर सबसे प्रीत लगा बैठी।

परछाई बीते लम्‍हों की,

हमको देती ज्ञान सदा।

बीत गये जो पल जीवन के,

उनको मत तू खोज सदा।

बीते पल वापस न आते,

वो तो बस यादें बन जाते।

इन यादों में मत खो पागल,

और भविष्‍य के स्‍वप्‍न सजा।

आने वाले लम्‍हों के हित,

तू बढ़ता जा, बढ़ता जा।

—————————कुमार आदित्‍य