कुछ दिनों से
थकान सी है,
पर नहीं है
मेरे पास कोई गोद,
जिसमें सो सकूं मैं,
चैन की नींद,
थक गया हूं,
इतना की अब,
चला नहीं जाता,
ठहरी है जिंदगी,
अपने ही चौराहे पर,
किस रास्ते जाना है,
पता ही नहीं,
तलाश है मुझे उसकी,
जो पहुंचा दे,
मंजिल तक,
पर मैने सुना है,
कोई किसी का,
साथ नहीं देता,
क्योंकि वो भी,
तो मेरे जैसा,
भटका हुआ देवता,
उससे कहो,
चल चलें,
हाथ में थाम हाथ,
इसी बहाने,
दोनों पा लेंगे,
अपनी-अपनी मंजिल,
पर क्या मिलेगा,
मंजिल तक पहुंच कर भी,
इसी उधेड़बुन में,
बीत चुकी है,
आधी जिंदगी,
चौराहे पर खड़े-खड़े,
और जिंदगी है,
चलने का नाम ही नहीं लेती।—————-कुमार आदित्य


