चौराहे पर जिंदगी…

कुछ दिनों से

थकान सी है,

पर नहीं है

मेरे पास कोई गोद,

जिसमें सो सकूं मैं,

चैन की नींद,

थक गया हूं,

इतना की अब,

चला नहीं जाता,

ठहरी है जिंदगी,

अपने ही चौराहे पर,

किस रास्‍ते जाना है,

पता ही नहीं,

तलाश है मुझे उसकी,

जो पहुंचा दे,

मंजिल तक,

पर मैने सुना है,

कोई किसी का,

साथ नहीं देता,

क्‍योंकि वो भी,

तो मेरे जैसा,

भटका हुआ देवता,

उससे कहो,

चल चलें,

हाथ में थाम हाथ,

इसी बहाने,

दोनों पा लेंगे,

अपनी-अपनी मंजिल,

पर क्‍या मिलेगा,

मंजिल तक पहुंच कर भी,

इसी उधेड़बुन में,

बीत चुकी है,

आधी जिंदगी,

चौराहे पर खड़े-खड़े,

और जिंदगी है,

चलने का नाम ही नहीं लेती।—————-कुमार आदित्‍य

हौसला…

जिंदगी नाम है जीने का,

हर पल आजमाती,

कभी अंधेरों से  तो

कभी ऊंचाई से,

हमको डराती है,

पर सच तो ये है कि

हमें जीना सिखाती है

लड़ना सिखाती है,

मौर्चों पर डटना सिखाती है,

ये सब होता है

एक अनजान शख्‍स की बदौलत,

जो हर किसी के  दिल में बसता,

सारा जग इसे

‘हौसला’ कहता है,

मेरा भी हौसला कुछ ऐसा ही,

बहुत दिनों तक

समझ ही नहीं पाया,

पर आज जब कठिनाइयों से ,

पार जाकर अपनी मंजिल,

का पहला पायदान चढ़ लिया,

तब लगा कि कोई है,

जो दिलासा देता है,

जीत जाने का,

हार को पचा जाने का,

सच है यारों ‘हौसला’ न हो,

तो जिंदगी न जाने कब,

मौत का दामन थाम ले,

इसलिए मैं कहता हूं,

सम्‍हालो अपने हौसले को वक्‍त की खातिर,

आए हो इस जहां में हर खुशी जीने के‍ लिए।।

——————————————कुमार आदित्‍य

हां खुद से अनशन करता हूं…

खुद से अनशन कर बैठा हूं,

आखिर मैं चुप क्‍यों बैठा हूं ?

दूर है मंजिल, राह कठिन है,

फिर क्‍यों में थककर बैठा हूं ?

 

जन्‍म लिया था, चाल थी पकड़ी,

संकल्‍प लिया था कुछ करने को,

मन ही मन उठ रहे द्वंद थे,

कुछ देकर जाऊंगा जग को,

अब होता आभास यही है,

क्‍या अपनी राहें भटका हूं,

दूर है मंजिल, राह कठिन है,

फिर क्‍यों मैं थककर बैठा हूं ?

 

अब मैने है मन में ठानी,

लिखूंगा में नई कहानी,

राहें नईं बनाऊंगा,

नई ज़वानी लाऊंगा,

जीत नए युग की लिखता हूं,

मैं खुद से अनशन करता हूं।

 

जिससे चलना थम ना जाए,

मन में मेरे भ्रम न आए,

गीत मेरे दुनिया ये गाए,

तभी निरंतर मैं चलता हूं,

हां खुद से अनशन करता हूं।

हां खुद से अनशन करता हूं।