ख्‍वाव…

क्‍या खूब होते हैं ये ख्‍वाव,

कभी इतने नाजु़क,

ज़रा सी आवाज हुई,

और हो गए ओझल ,

कभी जागती आंखों से देखे जाते हैं,

कभी उनीदी सी आंखों का सहारा,

कभी इतने विस्‍तृत,

आकाश की तरह,

छोर खोजना ही मुश्किल,

बचपन में यही ख्‍वाव,

लहलहाते हैं,

हरी-भरी फसल की तरह,

इन्‍हीं ख्‍वावों की पलकों पर,

होती है हमारे अरमानों की हकीकत,

ज़वानी इन्‍हीं छुए-अनछुए ख्‍वावों की सीढ़ी,

पर रास्‍ता पाती है,

लेकिन न पूरे हो तो टूट जाते हैं,

क्‍या खूब होते हैं ये ख्‍वाव।

—————————-कुमार आदित्‍य

दिल की दुआ…

दिल से मेरे है निकलती बस यही दुआ,

उन सभी का रख ख़याल ये मेरे खुदा।

जिनके दिलों में दर्द हो देश के गमों का,

सीख लिया हो जिन्‍होंने जीने का सलीका।

 

नेंमतें बरसा तू हरदम उनके आंगन में,

जो बसाए हों तेरी तस्‍वीर को मन में,

उनको ही दे हर दफा तू खुदी की दुआ,

झूक रहा हो जिसका सर सज़दे में ये खुदा।

 

न देना उनको गम न जुदाई का ही सितम,

जिसने तुझे मान लिया अपना हमकदम।

झूठ कोई बोले गर तो उसको सच सिखा,

बेईमानों को सज़ा दे और दिखा रस्‍ता।

 

जुल्‍म की तस्‍वीर को तू यूं मिला दे ख़ाक में,

बस अमन और चैन ही हो आदमी के देश में।

‘आदित्‍य’ चल रहा है तेरी राह पर खुदा,

करना न उसको तू खुद से कभी जुदा।