
मैं ‘गांव’ हूं,
पर वक्त की मार से,
बदल रहा हूं हर पल,
पल-पल खो रहा हूं,
अपना अस्तित्व,
मेरी तालाबों पर,
बन गए हैं महल,
खेतों की हरियाली,
बन गई है कंकरीट,
अब कोई भी,
गर्मी की शांति को,
नहीं रोपता है,
बरगद, पाकड़ और पीपल,
शायद इसीलिए,
राहगीर इस और नहीं आते,
और न ही लगता है,
कोई प्याऊ,
प्यासा गला सींचने को,
मंदिरों में घंटीं की आवाज,
कम हो चली है,
वक्त कहां है अब,
पूजन-अर्चन का,
मैं बदल रहा हूं,
गौधूलि वेला में,
गायों के गले की घंटी,
अब नहीं बजती,
और न ही उठती है,
उनकी पदचाप से धूल,
हां अब इसकी जगह ले ली है,
उद्योगों से निकलने वाले,
धूएं और सायरन ने,
नित घुट रहा है,
मेरी संस्कृति का गला,
जिसे वर्षों संवारकर रखा मैंने,
अब बच्चे नहीं करते,
बड़ों का सम्मान,
भूल गए आदर सूचक शब्द,
गांव से निकलने वाली सड़क पर,
कान्वेंट जो बन गया है,
विकास की अंधी आंधी में,
उजड़ गए सैकड़ों घर,
बिखर गए परिवार,
एक ही घर में जलते हैं,
कई चुल्हे,
कंकरीट के घरों में रहने वालों के,
दिल भी पत्थर हो गए,
मैं गांव हूं,
कहां जा रहा हूं मुझे नहीं पता,
लोग इसे ही कहते हैं विकास,
पर मैं बदल रहा हूं,
हर पल, पल-पल।
(गांव से लौटकर मन में उभरी उथल-पुथल, सच में बदल रहा है गांव का परिदृश्य, अब गांव-गांव न रहे, न रहा जीने का वा हौसला)——————आदित्य शुक्ला
