आखिर कब तक…

देखकर यूं भूख से मरते चमन को,

रो उठा है आज फिर से  दिल कोई।

धूं-धूं होकर जला रहा है घर किसी का,

मर रहा है भूख से फिर आज कोई।।1।।

रो रहा है फूल कोई पेट की इस आग में जल,

इस हृदय में चुभ रहा है शूल कोई।

मर रहे हैं अन्‍नदाता और नेता सो रहे हैं,

क्‍या हुई चुनने में हमसे भूल कोई।।2।।

सूखे मां के आचलों में फिर से भरना है उजाला,

लड़नी होगी फिर से हमको जंग कोई।

खोखली बातों से हरगिज न बनेगी बात अब,

लेना हमको आज होगा फिर नया संकल्‍प कोई।।3।।

चल चलें इस देश को फिर से सजाएं और संवारें,

भटके के लोगों को दिखाएं फिर अनोखी राह कोई।

कब तलक यूं ही चलेगा मौत का ये सिलसिला,

अब बनाना ही पड़ेगा फिर नया कानून कोई।।4।।

———————————————-कुमार आदित्‍य

हां खुद से अनशन करता हूं…

खुद से अनशन कर बैठा हूं,

आखिर मैं चुप क्‍यों बैठा हूं ?

दूर है मंजिल, राह कठिन है,

फिर क्‍यों में थककर बैठा हूं ?

 

जन्‍म लिया था, चाल थी पकड़ी,

संकल्‍प लिया था कुछ करने को,

मन ही मन उठ रहे द्वंद थे,

कुछ देकर जाऊंगा जग को,

अब होता आभास यही है,

क्‍या अपनी राहें भटका हूं,

दूर है मंजिल, राह कठिन है,

फिर क्‍यों मैं थककर बैठा हूं ?

 

अब मैने है मन में ठानी,

लिखूंगा में नई कहानी,

राहें नईं बनाऊंगा,

नई ज़वानी लाऊंगा,

जीत नए युग की लिखता हूं,

मैं खुद से अनशन करता हूं।

 

जिससे चलना थम ना जाए,

मन में मेरे भ्रम न आए,

गीत मेरे दुनिया ये गाए,

तभी निरंतर मैं चलता हूं,

हां खुद से अनशन करता हूं।

हां खुद से अनशन करता हूं।