जिसे दुनिया ज़‍िन्‍दगी नाम देती है…

मानक

 

कभी उलझन, कभी सुलझन

कभी हर बात होती है।

कभी चलती है पुरबाई,

कभी पछुआ भी ब‍हती है।

कभी सूरज भी तपता है,

कभी बरसात  होती है।

कभी हम जीत जाते हैं,

कभी तो हार होती है।

खोज़ता रहता है हरदम,

जिसे तू जान ले पगले,

यही तो है जिसे दुनिया,

ज़‍िन्‍दगी नाम देती है।

कभी भूखे भी सो जाने की,

आदत हो ही जाती है।

कभी तो हर खुशी जग की,

हमारे पास होती है।

नदी के पास होने पर,

कभी न प्‍यास बुझती है।

जीना है जो दुनिया में तो,

मरने की  कला को सीख।

यही तो है जिसे दुनिया,

ज़‍िन्‍दगी नाम देती है।

कभी मेरी कलम चलती है,

गीतों को बनाती है।

शब्‍द जब साथ छोड़ें तो,

कभी कविता लजाती है।

राह की ठोकरें हमको,

कभी संदेश देती है।

कभी ये ठोकरें हमको,

निगाहों से गिराती है।

हमें अफसोस है कि,

अब तलक जीना नहीं सीखे।

यही तो है जिसे दुनिया,

ज़‍िन्‍दगी नाम देती है।

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7 thoughts on “जिसे दुनिया ज़‍िन्‍दगी नाम देती है…

  1. कभी ये खेलती हमसे , कभी हमको खिलाती है
    अचानक क्यूँ भला फिर यूँ , हमी से रूठ जाती है ……

    बहुत सुन्दर रचना…..और आपको इस कविता की लायबद्ध्त्ता के लिए दिली मुबारकबाद देना चाहूँगा आदित्य जी …….
    ऐसे ही रवि की रश्मियों की तरह चमकते और चमकाते रहिये काव्य जगत को ….

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