जीवन विश्‍लेषण…

मानक

घरबार छुडा़ देती हैं चाहतें,

संबंध टूट जाते हैं सारे,

डर को भी मिटा देती हैं चाहतें,

मर्यादाओं को तोड़कर पथ बनाते हैं हम,

सपनों को भी पंख लगा देती हैं चाहतें।

 

न रहता है ममत्‍व,

अपनत्‍व को भी तिलांजलि दिलवाती हैं चाहतें,

स्‍वतत्‍व का भी मोल न रहता,

ये कुछ पाने की चाहत ही,

हमें क्‍या से क्‍या बना देती है।

 

मगर जब होश आता है,

तो सबकुछ अज़ब लगता है,

ये अभिप्‍सा का सफ़र,

बहुत ही गज़ब लगता है।

 

इस सफ़र में न तो लक्ष्‍य मिलता है,

न ही मिलती है सुख-शांति,

गिरगिट की तरह क्षण में बदलती है,

भौतिकता की भ्रांति।

 

जहां हम खोजते सुख को,

वहां बस दु:ख ही मिलता है,

भटकते रह‍ते हैं हरदम,

नहीं कुछ हाथ लगता है।

 

तृष्‍णाओं के महल को बनाते-बनाते,

हम खुद ही कठपुतली बन जाते हैं,

इन्‍हीं के फेर में फंसकर,

हम रोते हैं बिलबिलाते हैं।

 

जब लगती चोट है हमको,

तो मन में भाव आते हैं,

जिसे तू भूल बैठा है,

वो ईश्‍वर याद आते हैं।

 

इन्‍ही के साथ जब रहना,

तो भटका क्‍यो रहा बंदे,

चलो अब मौज आएगी,

जो अब सुधारे, तो सब सुधारे।

 

उन्‍हीं की शरण में रहकर,

नांव को पार करना है,

न जीना है व्‍यथित होकर,

न तूफानों से डरना है।

 

अब हमें तो जीवन भर,

उसकी शरण में रहना है।

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7 thoughts on “जीवन विश्‍लेषण…

  1. शुक्ल जी आपकी लेखनी से निकलते इन मोतियों के क्या कहने…किन्तु शायद ये चाहत ही हैं जो जीने की दिशा निर्धारित करती हैं …परन्तु जब इन पर आशक्ति का रंग चढ़ता है तब शायद पतन अपना द्वार खोल देती है……

    बहुत बधाई आपकी इस उम्दा रचना के लिए…..

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