रात की तन्‍हाई, चांद और एक तारा…

मानक

रात की तन्‍हाई और चांद का,

बहुत ही अटूट रिश्‍ता है,

चांद साथ देता है तन्‍हाई का,

तन्‍हाई इसे अपना प्रियतम समझ,

चांदनी के आगोश में,

खुद को समेट लेती है,

आंखों की पुतलियों पर चलता है,

चांद और तन्‍हाई के बीच,

यह अद्भुत लुका‍-छिपी का खेल,

यह चांदनी ही तो है,

जो बनती है किसी शायर की गज़ल,

किसी का पैगाम,  किसी की इन्‍तहा,

लेकिन इस चांद के साथ कोई,

और भी रहता है,

सारा जग इसको तारा कहता है,

यह हरपल चांद के साथ,

कदमताल करता है,

और निरर्थक कोशिश करता है,

चांद का पाने की,

महीने, साल, सदियां गुजर जाती है,

यह सब यूं ही चलता है,

चांद बढ़ता है, घटता है,

नीले गगन की चादर पर लेटकर,

अठखेलियां करता है,

यह तारा भी चांद के साथ झूमता है,

थिरकता है, गाता है, खुशियां मनाता है,

अचानक दुधिया बादलों का एक टुकड़ा,

ढक लेता है दोनों को, इस तरह,

मानों दोनों का मिलन पूरा हुआ,

लगता है कुदरत ने जुटा लिया है,

मिलन का सजो-समान,

अगले ही पल ठंडी कोमल हवा झोंका,

बादलों के टुकड़े का गाल सहलता है,

उसे अपने साथ ले जाता है,

कहने लगता है मिलन,

जुदाई की कहानी,

तब लगता है कि ये चांद और तारे,

अब भी न जाने कितनी दूर हैं,

अभी भी अधूरी है तारे की हसरत,

मिला होगा इन दोनों का तउम्र,

दूर रहने का अभिशाप,

लेकिन हर रोज चांद के साथ,

दिखता है यह तारा,

इस आरज़ू के साथ,

कोई बादल का टुकड़ा फिर,

बनेगा इनके मिलन का गवाह,

इसी तरह चलता है चांद-तारे,

का यह सफ़र,

इसके उलट तन्‍हाई चांद की अपनी है,

चांद और तन्‍हाई हमेशा साथ हैं,

रात की तन्‍हाई और चांद का,

बहुत ही अटूट रिश्‍ता है,

चांद साथ देता है तन्‍हाई का,

तन्‍हाई इसे अपना प्रियतम समझ,

चांदनी के आगोश में,

खुद को समेट लेती है,

आंखों की पुतलियों पर चलता है,

चांद और तन्‍हाई के बीच,

यह अद्भुत लुका‍-छिपी का खेल।———–आदित्‍य शुक्‍ला

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