दर्द-ए-दिल…

मानक

मेरी उदासी का शबब दिल बन गया ऐसे,

अकेलेपन के सिवा कुछ भी दिखाई ही न दे।

तू इस तरह बसा गया है मेरी सांसों में,

तेरी आवाज के सिवा कुछ भी सुनाई ही न दे।

 

जिन्‍हें था ख्‍वाव समझा वो बने हैं बेडियां मेरी,

मुझे तकलीफ है ये उसको दिखाई ही न दे।

न कर मुझसे मुहब्‍बत मगर इतना तो बता,

जाऊं मैं किस गली कोई राह दिखाई ही न दे।

 

चंद रातों ने तड़पाया है मुझे हद से ज्‍यादा,

कौन सुनेगा ये दास्‍तां किसी को सुनाई ही न दे।

ये मेरे दोस्‍त मुझको जिंदगी की दुआ दे,

अब मुझे उसके सिवा कुछ भी सुझाई भी ने दे।

——————————————-कुमार आदित्‍य

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