क्यों रे अमलतास

मानक

Image
क्यों रे अमलतास,
निकल गई न,
तेरी सारी हेकड़ी,
कुछ रोज पहले तक,
बहुत गुमान था,
तुझे अपने वासंती यौवन पर,
तुझ पर ही तो छाया था,
अद्भुत वासंती रंग,
लोग तेरी सुंदरता देखकर,
अघाते नहीं थे,
काश! बरकरार रहती,
तेरी सुंदरता,
अब झड़ चुके हैं,
तेरे फूल और पत्ते,
तू तो ऐसा लग रहा है,
मानों हो शिकार,
भुखमरी का कई सालों से,
तेरे सूखे फल,
बयान कर रहे हैं कहानी,
कि पतझड़ ने,
तुझे भी नहीं छोड़ा,
खैर तू ही नहीं हर कोई,
झेलता है पतझड़ की मार,
जीवन भी तो,
कभी बचपन में हंसता है,
और कभी इसमें मचल उठता है,
वासंती यौवन,
और कभी औरों की राह ताकता
बुढ़ापा देख,
कांप जाती है रूह,
तेरा हाल भी वही हुआ,
अमलतास,
जो कल तक तुझे,
निहारा करते थे जी,
आज नहीं देखना चाहते तुझे,
पर इस पर रुदन मत करना,
फिर से वसंत आयेगा,
तू फिर से मचलेगा,
किसी और जनम में।———आदित्य शुक्ला

(सुबह-सुबह अमलतास के पेड़ को देखकर मन में उभरा संवाद, बन गया काव्य)

Advertisements

5 thoughts on “क्यों रे अमलतास

  1. बहुत प्यारी कविता है ..
    मगर आदित्य जी बुरा न माने तो एक बात कहूँ ……कि आजकल तो अमलतास शबाब पर है….इन्हीं दिनों तो ये लदा रहता है फूलों से….मानों अशर्फियाँ लटक रही हों,खालिस सोने की…..
    (या हो सकता है आपने ये कविता किसी और मौसम में लिखी हो )

    अनु

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s