कुछ खटकता है अंतस में…………………..

मानक

हर बार रह-रहकर,
कुछ खटकता है,
अंतर्मन में।

कुछ कर गुजरने को कहती है,
छलकते मोतियों की तोतली बोली,
पर न जाने क्‍यों,
हर बर ठिठक से जाते हैं कदम,
मानो जैसे पावों में डाल दी हों,
किसी ने बेडियां।

ये क्‍या है,
समाज का भय, या परिवार,
मां-बाप, भाई-बहन, पत्‍नी-बच्‍चों का मोह,
यह समझ से परे है,
पर सच ये है कि अंतम प्‍यासा है,
जीने की आशा के साथ,
हर बार पुकार लगता है।

प्रकृति, पशु, विहग,
नदी, नाले, संमदर,
चांद, तारे, सूर्य और अंबर,
सब अपने से लगते हैं,
जैसे संसार का समस्‍त वैभव,
हमने पा लिया हो,
पर दूरी का अहसास कचोटता है।
हर उठ खड़ा होता है एक प्रश्‍न,

क्‍या किया
हमने इस वैभव की रक्षा के हित,
कुछ भी तो नहीं,
फिर कैसा अधिकार तुम्‍हें,
इसके साथ रहने का।

कब जागेगा संकल्‍प,
जो बेडि़यों का तोड़,
अंतस की पुकार पर,
चल पड़ेगा कोई,
विश्‍व विजय की पताका लिए,
स्‍वतंत्रता की प्राप्ति के लिए।

हर बार रह-रहकर,
कुछ खटकता है,
अंतर्मन में।

भोर में अंतर्मन के साथ अमिट संवाद के पल, सच में अनमोल होते हैं।————–आदित्‍य शुक्‍ला

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