तुम पथिक हो ………………

मानक

traveller

दूर पूरब से उगा सूरज अनोखा,
लालिमा हर ओर बिखरी यूं की मानों,
पर्वतों की चोटियों पर स्वर्ण का अंबार जैसे,
विगह कोई गा रहें हो राग अनुपम,
झूमते हों पवन संग देवदारों के सघन वन,
दूर पगडंडी में कोई चल पड़ा है राह अपनी,
मार्ग के कंकड़ नुकीले भेद देते पांव कोमल,
पर न उसकी लक्ष्य से होती कभी भी दृष्टि ओझल,
है कठिन पथ पर न रूकता न ही थकता,
एक धुन है मन में उसके लक्ष्य पाना,
चलते जाना चलते जाना बढ़ते जाना,
क्या दोपहरी रोक देगी कदम उसके,
न,कभी ऐसा न होगा,
एक बदरी जब उठेगी साथ देगी,
और तपते सूर्य की किरणों के आगे,
आके खुद को रोक लेगी,
जब कभी भी प्यास से व्याकुल वो होगा,
रास्ते के कई झरने साथ होंगें,
वो निरंतर पथ चलेगा,
लक्ष्‍य तक आगे बढ़ा, आगे बढ़ेगा
सांझ फिर से शांति का आभास लेकर,
आयेगी जब अंत का संताप हरने,
जीत जायेगा पथिक फिर लक्ष्य अपना,
हो कठिन पथ पर न रूकना, तुम पथिक हो,
है तुम्हारा धर्म चलना।———————-कुमार आदित्‍य

तत्वामसि………

मानक

Kal Halki Halki Barish thi

जब, मैं और तुम,
एक ही हैं
फिर मेरे हराने,
या तुम्‍हारे जीतने से,
कोई फर्क नहीं पड़ता,
तुम्‍हारा हारना हुआ,
मेरा हारना हुआ,
और तुम्‍हारी जीत,
मेरी जीत होगी,
फिर ये होड़ कैसी है,
तेज दौड़ने की,
तुम्‍हें याद होगी न
बचपन की कहानी,
एक खरगोश था
और था एक कछुआ,
अगर दोनों साथ चलते,
तो लोग उनकी मिसाल देते,
पर एक हार गया,
और एक जीत गया,
हां एक बात और भी है,
इस कहानी की,
तेज चलने वाले,
जल्‍दी थक जाते हैं,
और जिन्‍हें तय करनी है,
लम्‍बी दूरी,
वो साधे और मजबूत,
कदम आगे बढ़ाते हैं,
हां विजेता भी वही होते हैं,
अब तय तुम्‍हें करना है,
विजेता बनाना है,
या थककर हार जाना है,
चयन तुम्‍हारा है,
पर एक बाद याद रखना,
मैं, तुम और हम दोनों,
एक ही हैं।——————————————-आदित्‍य शुक्‍ला

कभी कभी मन करता है…..

मानक

कभी कभी मन करता है,
समंदर किनारे तुम्‍हारे साथ,
निहारूं डूबते सूरज को,
गुजारूं तुम्‍हारे साथ,
लालिमा से भरी एक शाम,

फार्म हाऊस की सूनसान छत पर,
तेरे एहसास को जिऊं,
छुअन और आलिंगन की गवाह बने,
सितारें से भरी चांदनी रात,

सावन के बरसते बादलों मे,
तुम्‍हारे साथ भीगूं,
छप-छप करते हुए,
जियूं अपना बचपन,

कभी कभी मन करता है,
तेरा हाथ पकड़ कर करूं,
लम्‍बी दूरी तक यात्रा,
यूं ही गुजर जाए एक उम्र।————–आदित्‍य शुक्‍ला

मनभावन, सावन आयो रे…….

मानक

sawan

आयो रे आयो रे,

मनभावन, सावन आयो रे,
मनभावन, सावन आयो रे,

आयो रे आयो रे,

सखि गीत सु‍हावन गाओ रे,
मनभावन, सावन आयो रे,

कैसे गाऊं गीत सुहावन,
छोड़ गए हमका जब साजन,
अापन तो बस यही कहानी,
झर-झर आंख झरत है सावन,
मैं बिरहानी बिरह की मारी,
फिरत रहूं मैं मारी-मारी,
हो सूखो बीतो जाये सवनवा,
कैसे सुर लग जावे,

मन भावन सावन आयो रे,
सखि गीत सुहावन गाओ रे,

पिया हंसी मन ऐसे बासी,
कछु भी रास न आवे,
कौन देश जा बैठे सजनवा,
हो कोई संदेशा लावे,
लाख जतन कर हारी मैं तो,
रतियां नींद न आवे,
हो बैरी छुप-छुप नीर बहावे,
कैसे दिल बहलावे।

मन भावन सावन आयो रे,
सखि गीत सुहावन गाओ रे।

बागन-बागन मैं दुखियारी,
देखत हूं मैं राह तुहारी,
ताल के बरगद झूलन जाऊं,
तुम बिन कैसे पैंग बढ़ाऊं,
खो बैठी में सुध-बुध अपनी,
कछु भी रास न आवे,
हो साजन काहे मोह सतावे,
कौन काल तू आवे।

मन भावन सावन आयो रे,
सखि गीत सुहावन गाओ रे।

आयो रे आयो रे,

सखि गीत सु‍हावन गाओ रे,
मनभावन, सावन आयो रे।

मनभावन सावन आयो रे।——————आदित्‍य शुक्‍ला

तुम्‍हारी जरुरत

मानक

पतझड़ के साथ,
गिरते तेरी यादों के पत्‍तों,
मैं हर रोज लिखता हूं,
कुछ नया,
परंतु पीले होते इन पत्‍तों की,
हरितिमा को बचा नहीं पाता,
ये पत्‍तों कई दिनों से,
गिर रहे हैं लगातार,
तेरी यादों का पेड़,
बिना पत्‍तों के गंजा लगने लगा है,
एक दम सपाट गंजा,
अब तो तुमको आना ही होगा,
कुछ दिन यहां रहना,
इसकी देखभाल करना,
खाद-पानी देना,
जिससे नई कोपलों के साथ,
यादों का पेड़,
हो सके फिर से हरा-भरा,
लेकिन इस बार आना,
तो कभी वापस मत लौटना,
मैं देख नहीं सकता,
पर मेरी आंखों को हरियाली भाती है,
ठंडक पहुंचती है,
मेरे जे़हन में,
मेरी जिंदगी की हरितिमा को,
तुम्‍हारी जरुरत है।

(बिना आंखों के भी कभी-कभी……………………………….देखे जाते हैं निरुत्‍तर स्‍वप्‍न)

मेरा मधुमास मुझे दे दो………….

मानक

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मेरा आकाश मुझे दे दो,
वो मेरी प्यास मुझे दे दो,
लौटा दो मुझको गीत मेरे,
वो मेरी आस मुझे दे दो।

वो बचपन का छोटा कोना,
गुड्डे गुडियों का वो गौना,
वो बड़ी कहानी बाबा की,
दादी की गोदी में सोना,
लौटा दो मुझको प्यार मेरा,
वो बचपन का संसार मेरा,
मेरा उल्लास मुझे दे दो,
वो मेरी प्या‍स मुझे दे दो,
लौटा दो मुझको गीत मेरे,
वो मेरी आस मुझे दे दो।

जब खेतों में, खलिहानों में,
बैलों के घंटी बजती थी,
हरियाली की चूनर तब,
माता के सिर पर सजती थी,
लौटा दो मुझको वो वसंत,
जो खिलता था खलिहानों में,
मेरा मधुमास मुझे दे दो,
वो मेरी प्यास मुझे दे दो,
लौटा दो मुझको गीत मेरे,
वो मेरी आस मुझे दे दो।

अब कहां रहा वो दौर प्रिये,
न है बचपन की भोर प्रिये,
धरती सिसके है कोने में,
है समय बहुत घनघोर प्रिये,
कैसे लौटेगा वो बचपन?
कैसे लौटेगा वो वसंत?
कोई तो आस मुझे दे दो,
वो मेरी प्याझस मुझे दे दो,
लौटा तो मुझको गीत मेरे,
मेरा मधुमास मुझे दे दो।

मेरा आकाश मुझे दे दो,
वो मेरी प्यास मुझे दे दो,
लौटा दो मुझको गीत मेरे,
वो मेरी आस मुझे दे दो।————-आदित्य शुक्ला