भीड़…..

मानक

mob-mentality

भीड़ तो भीड़ ही होती है,
यही जाना था मैंने,
बचपन से लेकर आजतक, 
भीड़ की नहीं होती,
कोई जात—पात,
कोई वर्ण, कोई सम्प्रदाय,
धर्म इसलिए नहीं लिखूंगा,
क्योंकि मैने सीखा है,
धर्म जीवन पद्धति होती है,
हां अगर आप कहें,
भीड़ भी अपनाती है,
कोई जीवन पद्धति,
तो पहना सकता हूं मैं,
भीड़ को धर्म का मुल्लमा,
आजकल यही तो हो रहा है,
भीड़ को दिया जा रहा है,
धर्म, सम्प्रदाय, जाति
और वर्ण का नाम,
सेंकने को लिए रोटियां,
राजनीति की,
बढ़ाने को वोट बैंक,
भरमाने को देश के जरूरतों से,
ज्वलंत मुद्दों से,
वो नहीं देना चाहते जबाव,
किसी भी सवाल का,
इसमें कोई एक शामिल नहीं है,
हर किसी बनाया जा रहा,
हिस्सेदार और इसका शिकार,
एक ज़हर उतारा जा रहा है,
धीरे—धीरे, अहिस्ता, आहिस्ता,
हम सबकी नसों में,
जो बदल रहा है हमें,
एक अंधी बेपरवाह भीड़ में,
भीड़ तो भीड़ होती है,
पर आज उसका धर्म भी है,
वर्ण भी और जाति भी।——————————आदित्य शुक्ला

मिठास खो गई…..

मानक

time

 

 

 

 

 

 

ये जो दौर है उसके अपने कायदे
अपने कानून हैं,
हवाओं में बह रही हर बात,
शब्दश: सही होगी,
ये मुमकिन भी है, और नामुमकिन भी,
ये वक्त गहरी पड़ताल का है,
यहां बहुत सी दुकानें ऐसी हैं,
जिनकी उचाइयां तो बहुत हैं,
पर पकवान फीके ही मिलते हैं,
आजकल फीका जो पसंद करने लगे हैं,
मिठास का मज़ा अलग ही था,
पर कहीं खो गई मालूम पड़ती है।

इन्द्रधनुष के सात रंग…..

मानक

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सात रंग थे इन्द्रधनुष के,
हमने उनको बांट लिया,
साध लिये सब अपने मकसद,
हमने सबको बांट दिया।

कोई लाल लिये फिरता है,
कोई हरा घुमाता है,
कोई घूमे केसरिया ले,
मतलब का सब नाता है।

पीला रंग खुशहाली को,
कहां कौन अपनाता है,
नीला रंग आकाश सम्भाले,
वो तो सबको भाता है।

फूलों के रंग अच्छे लगते,
लाल प्रेम की गाथा है,
और बैजनी फुलवारी का,
रंग भी खूब हंसाता है।

हरियाली का रंग हरा है,
मन शीतल हो जाता है,
नदियों के नीला रंग देखो,
सबकी प्यासा बुझता है।

सूरज आता रोज रोज है,
संग केसरिया लाता है।
कोई भेद नहीं करता वो,
सबके भाग्य जगाता है।

फिर ये कैसे युद्ध छिड़ा हैं,
रंग रंग से भिड़ा पड़ा है
बिखर गया है इन्द्रधुनष क्यों,
भाई—भाई लड़ा पड़ा है।

मेरा भारत ऐसा ना था,
जिसने सबको अपनाया था,
सभी सुखी हों, सब निरोग है,
ऐसा नारा दोहराया था।

किसने इसका रूप बिगड़ा,
किसने खेल रचाया है,
दोहरेपन की घात लगाकर,
किसने हमला करवाया है।

बदल गये आदर्श हमारे,
आजाद, भगत अब कहां याद है,
न कबीर वाणी की चिंता,
न रैदास की बात याद है।

बिखर गये आजादी के स्वर,
टूकड़ों के स्वर गूंज रहे हैं,
चोर—चोर मौसेरे भाई,
उस पर रोटी सेंक रहे हैं।

क्या फिर कोई दौर आयेगा,
इन्द्रधनुष फिर बन पायेगा,
खुशियों की बरसात झरेगी,
भारत ‘भारत’ कहलायेगा।———आदित्य शुक्ला

 

तुम पथिक हो ………………

मानक

traveller

दूर पूरब से उगा सूरज अनोखा,
लालिमा हर ओर बिखरी यूं की मानों,
पर्वतों की चोटियों पर स्वर्ण का अंबार जैसे,
विगह कोई गा रहें हो राग अनुपम,
झूमते हों पवन संग देवदारों के सघन वन,
दूर पगडंडी में कोई चल पड़ा है राह अपनी,
मार्ग के कंकड़ नुकीले भेद देते पांव कोमल,
पर न उसकी लक्ष्य से होती कभी भी दृष्टि ओझल,
है कठिन पथ पर न रूकता न ही थकता,
एक धुन है मन में उसके लक्ष्य पाना,
चलते जाना चलते जाना बढ़ते जाना,
क्या दोपहरी रोक देगी कदम उसके,
न,कभी ऐसा न होगा,
एक बदरी जब उठेगी साथ देगी,
और तपते सूर्य की किरणों के आगे,
आके खुद को रोक लेगी,
जब कभी भी प्यास से व्याकुल वो होगा,
रास्ते के कई झरने साथ होंगें,
वो निरंतर पथ चलेगा,
लक्ष्‍य तक आगे बढ़ा, आगे बढ़ेगा
सांझ फिर से शांति का आभास लेकर,
आयेगी जब अंत का संताप हरने,
जीत जायेगा पथिक फिर लक्ष्य अपना,
हो कठिन पथ पर न रूकना, तुम पथिक हो,
है तुम्हारा धर्म चलना।———————-कुमार आदित्‍य

तत्वामसि………

मानक

Kal Halki Halki Barish thi

जब, मैं और तुम,
एक ही हैं
फिर मेरे हराने,
या तुम्‍हारे जीतने से,
कोई फर्क नहीं पड़ता,
तुम्‍हारा हारना हुआ,
मेरा हारना हुआ,
और तुम्‍हारी जीत,
मेरी जीत होगी,
फिर ये होड़ कैसी है,
तेज दौड़ने की,
तुम्‍हें याद होगी न
बचपन की कहानी,
एक खरगोश था
और था एक कछुआ,
अगर दोनों साथ चलते,
तो लोग उनकी मिसाल देते,
पर एक हार गया,
और एक जीत गया,
हां एक बात और भी है,
इस कहानी की,
तेज चलने वाले,
जल्‍दी थक जाते हैं,
और जिन्‍हें तय करनी है,
लम्‍बी दूरी,
वो साधे और मजबूत,
कदम आगे बढ़ाते हैं,
हां विजेता भी वही होते हैं,
अब तय तुम्‍हें करना है,
विजेता बनाना है,
या थककर हार जाना है,
चयन तुम्‍हारा है,
पर एक बाद याद रखना,
मैं, तुम और हम दोनों,
एक ही हैं।——————————————-आदित्‍य शुक्‍ला

कभी कभी मन करता है…..

मानक

कभी कभी मन करता है,
समंदर किनारे तुम्‍हारे साथ,
निहारूं डूबते सूरज को,
गुजारूं तुम्‍हारे साथ,
लालिमा से भरी एक शाम,

फार्म हाऊस की सूनसान छत पर,
तेरे एहसास को जिऊं,
छुअन और आलिंगन की गवाह बने,
सितारें से भरी चांदनी रात,

सावन के बरसते बादलों मे,
तुम्‍हारे साथ भीगूं,
छप-छप करते हुए,
जियूं अपना बचपन,

कभी कभी मन करता है,
तेरा हाथ पकड़ कर करूं,
लम्‍बी दूरी तक यात्रा,
यूं ही गुजर जाए एक उम्र।————–आदित्‍य शुक्‍ला

तुम्‍हारी जरुरत

मानक

पतझड़ के साथ,
गिरते तेरी यादों के पत्‍तों,
मैं हर रोज लिखता हूं,
कुछ नया,
परंतु पीले होते इन पत्‍तों की,
हरितिमा को बचा नहीं पाता,
ये पत्‍तों कई दिनों से,
गिर रहे हैं लगातार,
तेरी यादों का पेड़,
बिना पत्‍तों के गंजा लगने लगा है,
एक दम सपाट गंजा,
अब तो तुमको आना ही होगा,
कुछ दिन यहां रहना,
इसकी देखभाल करना,
खाद-पानी देना,
जिससे नई कोपलों के साथ,
यादों का पेड़,
हो सके फिर से हरा-भरा,
लेकिन इस बार आना,
तो कभी वापस मत लौटना,
मैं देख नहीं सकता,
पर मेरी आंखों को हरियाली भाती है,
ठंडक पहुंचती है,
मेरे जे़हन में,
मेरी जिंदगी की हरितिमा को,
तुम्‍हारी जरुरत है।

(बिना आंखों के भी कभी-कभी……………………………….देखे जाते हैं निरुत्‍तर स्‍वप्‍न)