मेरा मधुमास मुझे दे दो………….

मानक

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मेरा आकाश मुझे दे दो,
वो मेरी प्यास मुझे दे दो,
लौटा दो मुझको गीत मेरे,
वो मेरी आस मुझे दे दो।

वो बचपन का छोटा कोना,
गुड्डे गुडियों का वो गौना,
वो बड़ी कहानी बाबा की,
दादी की गोदी में सोना,
लौटा दो मुझको प्यार मेरा,
वो बचपन का संसार मेरा,
मेरा उल्लास मुझे दे दो,
वो मेरी प्या‍स मुझे दे दो,
लौटा दो मुझको गीत मेरे,
वो मेरी आस मुझे दे दो।

जब खेतों में, खलिहानों में,
बैलों के घंटी बजती थी,
हरियाली की चूनर तब,
माता के सिर पर सजती थी,
लौटा दो मुझको वो वसंत,
जो खिलता था खलिहानों में,
मेरा मधुमास मुझे दे दो,
वो मेरी प्यास मुझे दे दो,
लौटा दो मुझको गीत मेरे,
वो मेरी आस मुझे दे दो।

अब कहां रहा वो दौर प्रिये,
न है बचपन की भोर प्रिये,
धरती सिसके है कोने में,
है समय बहुत घनघोर प्रिये,
कैसे लौटेगा वो बचपन?
कैसे लौटेगा वो वसंत?
कोई तो आस मुझे दे दो,
वो मेरी प्याझस मुझे दे दो,
लौटा तो मुझको गीत मेरे,
मेरा मधुमास मुझे दे दो।

मेरा आकाश मुझे दे दो,
वो मेरी प्यास मुझे दे दो,
लौटा दो मुझको गीत मेरे,
वो मेरी आस मुझे दे दो।————-आदित्य शुक्ला

कुछ खटकता है अंतस में…………………..

मानक

हर बार रह-रहकर,
कुछ खटकता है,
अंतर्मन में।

कुछ कर गुजरने को कहती है,
छलकते मोतियों की तोतली बोली,
पर न जाने क्‍यों,
हर बर ठिठक से जाते हैं कदम,
मानो जैसे पावों में डाल दी हों,
किसी ने बेडियां।

ये क्‍या है,
समाज का भय, या परिवार,
मां-बाप, भाई-बहन, पत्‍नी-बच्‍चों का मोह,
यह समझ से परे है,
पर सच ये है कि अंतम प्‍यासा है,
जीने की आशा के साथ,
हर बार पुकार लगता है।

प्रकृति, पशु, विहग,
नदी, नाले, संमदर,
चांद, तारे, सूर्य और अंबर,
सब अपने से लगते हैं,
जैसे संसार का समस्‍त वैभव,
हमने पा लिया हो,
पर दूरी का अहसास कचोटता है।
हर उठ खड़ा होता है एक प्रश्‍न,

क्‍या किया
हमने इस वैभव की रक्षा के हित,
कुछ भी तो नहीं,
फिर कैसा अधिकार तुम्‍हें,
इसके साथ रहने का।

कब जागेगा संकल्‍प,
जो बेडि़यों का तोड़,
अंतस की पुकार पर,
चल पड़ेगा कोई,
विश्‍व विजय की पताका लिए,
स्‍वतंत्रता की प्राप्ति के लिए।

हर बार रह-रहकर,
कुछ खटकता है,
अंतर्मन में।

भोर में अंतर्मन के साथ अमिट संवाद के पल, सच में अनमोल होते हैं।————–आदित्‍य शुक्‍ला

रिमझिम बारिश

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रिमझिम बारिश और
उसकी बूंदों का संगीत,
कभी सूना है तुमने,
ध्‍यान से,
आज मैं कह रहा हूं,
कभी सुनना,
तुम खो जाओगे,
उसकी धुन में,
जितना डूबोगे,
इस धुन में,
उतना मुझे पाओगे,
बस यही फर्क है,
मुझमें और तुममें,
मैं तुम्‍हारे सामने हूं,
बाहें फैलाकर खड़ा हूं,
और तुम हो कि नहीं चाहते,
मुझे पाना,
मैं हर कण में हूं,
हर क्षण में हूं,
हर धुन में हूं,
हर ताल में हूं,
हर मौसम में हूं,
हर सावन में हूं,
हर सूखे में हूं,
हर भूखे में हूं,
हर किताब में,
हर गुलाब में,
जर्रे-जर्रे में,
बस मैं ही तो हूं
बस तुम कब,
पा सकोगे मुझे,
बस यही इंतजार है।——–आदित्‍य शुक्‍लाImage

”रात और नींद”

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रात भी क्‍या खूब है,
आती है सुलाने के लिए,
पर कभी-कभी भूल जाती,
कि उसका धर्म क्‍या है,
शायद बचपना,
हां शायद बचपना सवार हो जाता होगा उस पर,
अक्‍सर रात खेलती है मेरे साथ,
खुद तो सोती नहीं,
और न ही मुझे देती है सोने,
बीती रात भी बार-बार,
मुझे जगाया रात ने,
कई बार चला ये जगने-जगाने का खेल,
नींद और रात ने दोस्‍ती कर ली,
जैसे ले लिया हो प्रण,
आज तो नहीं सोने दूंगी,
फिर मैंने भी कोशिशें करना,
कर दिया बंद,
जागती रात के बाद,
जब सुबह खिड़की से जागी,
तो नींद निगोड़ी,
आ धमकी,
ये कहने कि अब सो जाओ,
मेरी सहेली चली जो गई है,
मैने कहा अब सोने का वक्‍त कहां,
अब तो जाना है,
तैयारी जो करनी है,
आने वाली रात के स्‍वागत की।————–आदित्‍य शुक्‍ला

क्यों रे अमलतास

मानक

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क्यों रे अमलतास,
निकल गई न,
तेरी सारी हेकड़ी,
कुछ रोज पहले तक,
बहुत गुमान था,
तुझे अपने वासंती यौवन पर,
तुझ पर ही तो छाया था,
अद्भुत वासंती रंग,
लोग तेरी सुंदरता देखकर,
अघाते नहीं थे,
काश! बरकरार रहती,
तेरी सुंदरता,
अब झड़ चुके हैं,
तेरे फूल और पत्ते,
तू तो ऐसा लग रहा है,
मानों हो शिकार,
भुखमरी का कई सालों से,
तेरे सूखे फल,
बयान कर रहे हैं कहानी,
कि पतझड़ ने,
तुझे भी नहीं छोड़ा,
खैर तू ही नहीं हर कोई,
झेलता है पतझड़ की मार,
जीवन भी तो,
कभी बचपन में हंसता है,
और कभी इसमें मचल उठता है,
वासंती यौवन,
और कभी औरों की राह ताकता
बुढ़ापा देख,
कांप जाती है रूह,
तेरा हाल भी वही हुआ,
अमलतास,
जो कल तक तुझे,
निहारा करते थे जी,
आज नहीं देखना चाहते तुझे,
पर इस पर रुदन मत करना,
फिर से वसंत आयेगा,
तू फिर से मचलेगा,
किसी और जनम में।———आदित्य शुक्ला

(सुबह-सुबह अमलतास के पेड़ को देखकर मन में उभरा संवाद, बन गया काव्य)

‘मैं ‘गांव’ हूं’

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मैं ‘गांव’ हूं,
पर वक्‍त की मार से,
बदल रहा हूं हर पल,
पल-पल खो रहा हूं,
अपना अस्तित्‍व,
मेरी तालाबों पर,
बन गए हैं महल,
खेतों की हरियाली,
बन गई है कंकरीट,
अब कोई भी,
गर्मी की शांति को,
नहीं रोपता है,
बरगद, पाकड़ और पीपल,
शायद इसीलिए,
राहगीर इस और नहीं आते,
और न ही लगता है,
कोई प्‍याऊ,
प्‍यासा गला सींचने को,
मंदिरों में घंटीं की आवाज,
कम हो चली है,
वक्‍त कहां है अब,
पूजन-अर्चन का,
मैं बदल रहा हूं,
गौधूलि वेला में,
गायों के गले की घंटी,
अब नहीं बजती,
और न ही उठती है,
उनकी पदचाप से धूल,
हां अब इसकी जगह ले ली है,
उद्योगों से निकलने वाले,
धूएं और सायरन ने,
नित घुट रहा है,
मेरी संस्‍कृति का गला,
जिसे वर्षों संवारकर रखा मैंने,
अब बच्‍चे नहीं करते,
बड़ों का सम्‍मान,
भूल गए आदर सूचक शब्‍द,
गांव से निकलने वाली सड़क पर,
कान्‍वेंट जो बन गया है,
विकास की अंधी आंधी में,
उजड़ गए सैकड़ों घर,
बिखर गए परिवार,
एक ही घर में जलते हैं,
कई चुल्‍हे,
कंकरीट के घरों में रहने वालों के,
दिल भी पत्‍थर हो गए,
मैं गांव हूं,
कहां जा रहा हूं मुझे नहीं पता,
लोग इसे ही कहते हैं विकास,
पर मैं बदल रहा हूं,
हर पल, पल-पल।

(गांव से लौटकर मन में उभरी उथल-पुथल, सच में बदल रहा है गांव का परिदृश्‍य, अब गांव-गांव न रहे, न रहा जीने का वा हौसला)——————आदित्‍य शुक्‍ला