तुम्‍हारी जरुरत

मानक

पतझड़ के साथ,
गिरते तेरी यादों के पत्‍तों,
मैं हर रोज लिखता हूं,
कुछ नया,
परंतु पीले होते इन पत्‍तों की,
हरितिमा को बचा नहीं पाता,
ये पत्‍तों कई दिनों से,
गिर रहे हैं लगातार,
तेरी यादों का पेड़,
बिना पत्‍तों के गंजा लगने लगा है,
एक दम सपाट गंजा,
अब तो तुमको आना ही होगा,
कुछ दिन यहां रहना,
इसकी देखभाल करना,
खाद-पानी देना,
जिससे नई कोपलों के साथ,
यादों का पेड़,
हो सके फिर से हरा-भरा,
लेकिन इस बार आना,
तो कभी वापस मत लौटना,
मैं देख नहीं सकता,
पर मेरी आंखों को हरियाली भाती है,
ठंडक पहुंचती है,
मेरे जे़हन में,
मेरी जिंदगी की हरितिमा को,
तुम्‍हारी जरुरत है।

(बिना आंखों के भी कभी-कभी……………………………….देखे जाते हैं निरुत्‍तर स्‍वप्‍न)

क्यों रे अमलतास

मानक

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क्यों रे अमलतास,
निकल गई न,
तेरी सारी हेकड़ी,
कुछ रोज पहले तक,
बहुत गुमान था,
तुझे अपने वासंती यौवन पर,
तुझ पर ही तो छाया था,
अद्भुत वासंती रंग,
लोग तेरी सुंदरता देखकर,
अघाते नहीं थे,
काश! बरकरार रहती,
तेरी सुंदरता,
अब झड़ चुके हैं,
तेरे फूल और पत्ते,
तू तो ऐसा लग रहा है,
मानों हो शिकार,
भुखमरी का कई सालों से,
तेरे सूखे फल,
बयान कर रहे हैं कहानी,
कि पतझड़ ने,
तुझे भी नहीं छोड़ा,
खैर तू ही नहीं हर कोई,
झेलता है पतझड़ की मार,
जीवन भी तो,
कभी बचपन में हंसता है,
और कभी इसमें मचल उठता है,
वासंती यौवन,
और कभी औरों की राह ताकता
बुढ़ापा देख,
कांप जाती है रूह,
तेरा हाल भी वही हुआ,
अमलतास,
जो कल तक तुझे,
निहारा करते थे जी,
आज नहीं देखना चाहते तुझे,
पर इस पर रुदन मत करना,
फिर से वसंत आयेगा,
तू फिर से मचलेगा,
किसी और जनम में।———आदित्य शुक्ला

(सुबह-सुबह अमलतास के पेड़ को देखकर मन में उभरा संवाद, बन गया काव्य)

गाया प्यार का गीत दुबारा…

मानक

है वसंत का मौसम प्‍यारा, सूरज का बढ़ गया है पारा,

बारिश की टिप-टिप बूदों ने, गाया प्‍यार का गीत दुबारा।।1।।

पेड़ों से गिरते पत्‍तों ने,

पुष्‍पों की खिलती कलियों ने,

हर मन है अगन लगाई,

जैसे जागी हो तरूणाई,

इस मौसम का खेल निराला, मैं भी फिरता हूं मतवारा,

बारिश की टिप-टिप बूदों ने, गाया प्‍यार का गीत दुबारा।।2।।

जब ठंडक जाने को होती,

प्‍यारा मौसम आता है,

धरती की धानी चुनरी पर,

नभमंडल इतराता है,

फागुन के गीतों की धुन पर, बाजे मन का हर इकतारा,

बारिश की टिप-टिप बूदों ने, गाया प्‍यार का गीत दुबारा।।3।।

यह मौसम यादों का मौसम,

जब भी मिलने आता है,

हर दिल में होती है हलचल,

हर युवा मन गाता है,

कामदेव के रथ सवार हो, चंदा को मिल गया है तारा,

बारिश की टिप-टिप बूदों ने, गाया प्‍यार का गीत दुबारा।।4।।

चल चलें सजाएं प्रीत ज़रा,

खोजें अपना मनमीत ज़रा,

प्रेम हिलोर उठे जब दिल में,

गाएं फिर मल्‍हार ज़रा,

इस मौसम में इस जीवन को, प्रियतम का यूं मिले सहारा,

बारिश की टिप-टिप बूदों ने, गाया प्‍यार का गीत दुबारा।।5।।

है वसंत का मौसम प्‍यारा, सूरज का बढ़ गया है पारा,

बारिश की टिप-टिप बूदों ने, गाया प्‍यार का गीत दुबारा।।6।।

————————————————-कुमार आदित्‍य