इन्द्रधनुष के सात रंग…..

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सात रंग थे इन्द्रधनुष के,
हमने उनको बांट लिया,
साध लिये सब अपने मकसद,
हमने सबको बांट दिया।

कोई लाल लिये फिरता है,
कोई हरा घुमाता है,
कोई घूमे केसरिया ले,
मतलब का सब नाता है।

पीला रंग खुशहाली को,
कहां कौन अपनाता है,
नीला रंग आकाश सम्भाले,
वो तो सबको भाता है।

फूलों के रंग अच्छे लगते,
लाल प्रेम की गाथा है,
और बैजनी फुलवारी का,
रंग भी खूब हंसाता है।

हरियाली का रंग हरा है,
मन शीतल हो जाता है,
नदियों के नीला रंग देखो,
सबकी प्यासा बुझता है।

सूरज आता रोज रोज है,
संग केसरिया लाता है।
कोई भेद नहीं करता वो,
सबके भाग्य जगाता है।

फिर ये कैसे युद्ध छिड़ा हैं,
रंग रंग से भिड़ा पड़ा है
बिखर गया है इन्द्रधुनष क्यों,
भाई—भाई लड़ा पड़ा है।

मेरा भारत ऐसा ना था,
जिसने सबको अपनाया था,
सभी सुखी हों, सब निरोग है,
ऐसा नारा दोहराया था।

किसने इसका रूप बिगड़ा,
किसने खेल रचाया है,
दोहरेपन की घात लगाकर,
किसने हमला करवाया है।

बदल गये आदर्श हमारे,
आजाद, भगत अब कहां याद है,
न कबीर वाणी की चिंता,
न रैदास की बात याद है।

बिखर गये आजादी के स्वर,
टूकड़ों के स्वर गूंज रहे हैं,
चोर—चोर मौसेरे भाई,
उस पर रोटी सेंक रहे हैं।

क्या फिर कोई दौर आयेगा,
इन्द्रधनुष फिर बन पायेगा,
खुशियों की बरसात झरेगी,
भारत ‘भारत’ कहलायेगा।———आदित्य शुक्ला

 

वो बचपन का दौर…

मानक

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याद आ रहा वो दौर,
जब हम छोटे हुआ करते थे,
कई दिनों पहले
चालू हो जाता था गीतों की तैयारी,
चमचमाती ड्रेस में,
दौड़ जाते थे अपने स्‍कूल की ओर,
हाथ में खुद से बनाया हुआ,
तिरंगा लिए,
मिठाई के चक्‍कर में न जाने,
कहां कहां के चक्‍कर कटाते थे,
पर दिल में जज्‍बा हुआ करता था,
कुछ कर गुजरने का,
देश पर मर मिटने का,
मुझे याद है वो दिन,
जब गणतंत्र दिवस के मौके पर,
गाया थे मैने एक गीत,
तालियों की गड़गड़ाहट,
और उपहार में मिले पेन ने,
दिल में जोश भर दिया था,
पर अफसोस आज वो दौर नहीं है,
हम बड़े जो हो गए हैं,
अब तो बस,
भाषणबाजी करते हैं,
देश में ये समस्‍या है,
देश में वो समस्‍या है,
पर समाधान नहीं है,
समाधानों पर भी होती सिर्फ चर्चा,
कदम बढ़ाने आगे कौन आए?
मेरे जीवन के 25 गणतंत्र,
यूं ही गुजरे हैं,
समस्‍यों को सुनते हुए,
पर अब समाधान की राहें,
तलाशने का मन करता है,
बच्‍चा बन फिर से,
नचाने को मन करता है,
लम्‍बी-लम्‍बी लाइनों में रैलियां,
निकालकर,
जनता को जागने का मन करता है,
आओ मिलकर सब एक साथ,
बच्‍चों सा बन जाएं,
निर्लिप्‍त,
निर्मोह,
निर्दंद्व,
सब साथ मिलकर गढ़ें,
एक दिव्‍य भारत का स्‍वप्‍न।————–कुमार आदित्‍य

(पर काश! ऐसा संभव हो पाता, हम लौट पाते, बचपन के दौर में….)

”झूठे ख्‍वाव सी आजादी”

मानक

झूठे ख्‍वाव सी आजादी का वास्‍ता मत दे,

या खुदा मुझको ये सहारा मत दे,

टूट जाएंगी सब जंजीरें जुल्‍मों सितम की,

मुझको है तजुर्बा मुझे दगा मत दे।

अब भी भूखे हैं बच्‍चे उनके, जिनने पाला,

उनको उनके किए की सजा मत दे,

मेरे देश का हश्र क्‍या हो गया ऊपर वाले,

मौत दे दे मगर ऐसी बद्दुआ मत दे।

गर यूं ही चल रहा इस जमाने का दौर,

मुझे भी सूंकू भरी सुबह मत दे,

मुझे मालूम है तू अब नही आएगा यहां,

इन गरीबों को ऐसा आसरा मत दे।———कुमार आदित्‍य

न्यारा भारत…

मानक

स्वप्नों के साथ गुथे,

मेरे शब्द पंख लगाकर,

उड़ना चाहते हैं,

उत्तर के छोर से,

दक्षिण के छोर तक,

पूर्व से पश्चिम तक,

बिखरे हुए भारत को,

फिर जोड़ना के लिए,

जाग रही है मेरी आंखें,

कितना प्यारा था,

सुंदर और न्यारा था,

हमारा देश,

जहां का बचपना,

दूध की नदियों में नहाकर,

बड़ा होता था,

जिसकी जवानी,

लिखती थी,

शहादत की अमर गाथाएं,

जहां मां की कुर्बानियां,

वीरांगनाओं की कहानियां,

सुनकर,

फड़क उठती थीं भुजाएं,

ये सब कुछ,

खो सा गया,

न तो गाथाएं हैं,

न कहानियां,

न वीरांगनाएं,

न ही लिखी जाती हैं,

शहादत की अमर गाथाएं,

जकड़ गया है,

मेरा देश फिर से,

काले अंग्रेजों के चंगुल में,

ये सब अपने ही तो हैं,

पर न जाने क्यों,

कर रहे हैं अपनों पर अत्याचार,

इन्हें समझाओ,

मत करें गरीबों पर,

भ्रष्टाचार और महंगाई का जुर्म,

कहीं ऐसा न हो कि,

सोई हुई चिंगारी भड़क उठे,

जलाकर खाक कर दे,

अपनों को ही,

जुड़ा रहने थे भारत को,

बन जाने दें अखंड भारत।

मेरे शब्द कहीं बिखर गए,

पर एक स्वप्न पूरा हुआ,

शायद कल सुबह का भारत,

सबसे प्यारा हो,

सब देशों से न्यारा हो। —कुमार आदित्य