भीड़…..

मानक

mob-mentality

भीड़ तो भीड़ ही होती है,
यही जाना था मैंने,
बचपन से लेकर आजतक, 
भीड़ की नहीं होती,
कोई जात—पात,
कोई वर्ण, कोई सम्प्रदाय,
धर्म इसलिए नहीं लिखूंगा,
क्योंकि मैने सीखा है,
धर्म जीवन पद्धति होती है,
हां अगर आप कहें,
भीड़ भी अपनाती है,
कोई जीवन पद्धति,
तो पहना सकता हूं मैं,
भीड़ को धर्म का मुल्लमा,
आजकल यही तो हो रहा है,
भीड़ को दिया जा रहा है,
धर्म, सम्प्रदाय, जाति
और वर्ण का नाम,
सेंकने को लिए रोटियां,
राजनीति की,
बढ़ाने को वोट बैंक,
भरमाने को देश के जरूरतों से,
ज्वलंत मुद्दों से,
वो नहीं देना चाहते जबाव,
किसी भी सवाल का,
इसमें कोई एक शामिल नहीं है,
हर किसी बनाया जा रहा,
हिस्सेदार और इसका शिकार,
एक ज़हर उतारा जा रहा है,
धीरे—धीरे, अहिस्ता, आहिस्ता,
हम सबकी नसों में,
जो बदल रहा है हमें,
एक अंधी बेपरवाह भीड़ में,
भीड़ तो भीड़ होती है,
पर आज उसका धर्म भी है,
वर्ण भी और जाति भी।——————————आदित्य शुक्ला

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कल रात घर की ओर जाते हुए…

मानक

कल रात घर की ओर जाते हुए,

एक बूढ़ा मिला था,

इस ठिठुरती ठंड में,

कंपकपा रहा था,

कुछ प्रश्‍न किए थे,

मैने उससे,

कैसे जीते हो तुम ?

क्‍या हाल होता होगा तुम्‍हारा ?

फुटपाथ पर तुम रहते हो,

न ओढ़ने का चादर है,

न बिछाने को बिछौने,

न गर्मी  को आग है,

न खाने को चबैना,

आंखों में आंसू लिए,

भरे गले से दिए गए,

उसके जब़ाब ने मुझे,

मजबूर किया था,

कुछ सोचने के लिए,

जो चुभने जैसा था,

बोला था उनको हमारी,

जरुरत नहीं है,

जिन्‍हें काबिल बनाया,

महलों में रहने के,

वो ठुकरा गए,

अब  और कहां हो सकता है,

मेरा बसेरा,

उसे कुछ सामान दे,

मैं बढ़ गया था,

अपने घर की ओर,

ठंड से बचने के लिए,

रजाई के आगोश में,

खुद को समेटने,

रात को सोचता रहा,

कैसे जीता होगा वो,

इसी बीच न जाने कब,

नींद ने हमको

अपने आंचल में पनाह दी,

सुबह को देर से जागा,

सोचा उसे कुछ देकर आते हैं,

चल दिया उसी फुटपाथ की ओर,

पर वहां का नजारा कुछ अलग था,

आज फिर मैने प्रश्‍न किया,

ये पथिक क्‍या हुआ है यहां ?

कल रात सितारे भी चुप से थे,

चांद भी घबरा रहा था,

सुबह का सूरज देर से निकला,

वह भी शरमा रहा था।

बादलों की धुंध ने उसको भी ठक लिया,

इस कड़कड़ाती ठंड में यहां क्‍या हुआ है ?

लेकिन उत्‍तर देने वाला कोई ओर था,

मैं समझ गया वह बूढ़ा चल बसा था,

जो रात को बात कर रहा था।

यह भीड़ इसीलिए है,

एक यक्ष प्रश्‍न खड़ा हुआ,

कल रात जिसके पास कोई न था,

आज वहां लोगों की भीड़ है,

पर इस भीड़ में भी कोई उसका

अपना न है,

दफना देंगे लोग उसे,

कहीं पास के श्‍मशान में

ले जाकर,

लेकिन वह बूढ़ा एक प्रश्‍न

छोड़कर चला गया,

क्‍या यही होता है,

फुटपाथ पर रहने वालों

का जीवन ?