तुम्‍हारी जरुरत

मानक

पतझड़ के साथ,
गिरते तेरी यादों के पत्‍तों,
मैं हर रोज लिखता हूं,
कुछ नया,
परंतु पीले होते इन पत्‍तों की,
हरितिमा को बचा नहीं पाता,
ये पत्‍तों कई दिनों से,
गिर रहे हैं लगातार,
तेरी यादों का पेड़,
बिना पत्‍तों के गंजा लगने लगा है,
एक दम सपाट गंजा,
अब तो तुमको आना ही होगा,
कुछ दिन यहां रहना,
इसकी देखभाल करना,
खाद-पानी देना,
जिससे नई कोपलों के साथ,
यादों का पेड़,
हो सके फिर से हरा-भरा,
लेकिन इस बार आना,
तो कभी वापस मत लौटना,
मैं देख नहीं सकता,
पर मेरी आंखों को हरियाली भाती है,
ठंडक पहुंचती है,
मेरे जे़हन में,
मेरी जिंदगी की हरितिमा को,
तुम्‍हारी जरुरत है।

(बिना आंखों के भी कभी-कभी……………………………….देखे जाते हैं निरुत्‍तर स्‍वप्‍न)

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तुम्‍हें याद है न….

मानक

तुम्‍हें याद है न,

वो पहर,

जब हम मिले थे,

उन अनजान गलियों में,

जहां शुरू हुआ था,

जीवन का एक नया अध्‍याय,

मिलन के पलों का गवाह बना था,

वो छोटा सा गांव,

जो बसा है उन पहाड़ों के बीच,

जिनकी हरियाली से परिपूर्ण चोटियां,

जीने का मर्म समझाती है,

पथरीले रास्‍तों पर भी,

अडिग होकर बढ़ना सिखाती हैं,

कई कसमों, कई वादों के सहारे,

चल पड़ी थी हमारी गाड़ी,

किसी अनंत सफर पर,

फूलों के बागीचों के बीच,

पुष्‍पों के रंगों से खेली थी हमने होली,

मुझे किसी की नज़र न लगे,

तुमने लगा लिया था,

अपनी आंखों में काज़ल,

हम होते गए एक दूजे के,

मुझे अब भी याद है,

हर चुंबन हर आलिंगन के पल,

जो कभी भूलाये नहीं जा सकते,

तभी दौर आया कठिनाइयों का,

दोनों ने भरपूर साथ निभाया,

एक-दूजे का,

पर वक्‍त से लड़ते-लड़ते,

वो प्रेम का अल्‍हड़पन कहीं खो गया,

हम ज़वान हो गए,

खोने लगे भविष्‍य के सपनों में,

जिन्‍होंने बांध बना दिया,

हमारी भाव सरिता पर,

उसके प्रवाह को रोक दिया,

जो बहा करता था,

सिर्फ तुम्‍हारे लिए,

वो प्रवाह अब सपनों को,

संवारने और सजाने की मशीन बन गया,

उम्‍मीद थी कि बांध बना है,

तो गांव में उजाला भी होगा,

पर वह उम्‍मीद धूमिल हो गई,

वक्‍त के साथ,

मेरे दरवाजों में लग गया है जंग,

कई सालों से इसकी सफाई जो नहीं हुई,

अब कोई भी आता है पास,

तो डर जाता है देखकर गहराई,

मेरे जल में तूफानों के भंवर पड़ते हैं,

आज भी लोग,

मेरे जल से आचमन की चेष्‍टा करते हैं,

इसी के सा‍थ जन्‍मा,

तुम्‍हारे हृदय में अपार डर का अंबार,

जबकि तुम्‍हें पता था,

प्रेम अडिग है, अमिट है और है अपार,

तुम चाहती हो कि तुम्‍हें मिले,

पहले सा प्रेम,

उसके लिए करना होगा कुछ बलिदान,

प्रेम के बहते जल को बांधों मत,

उसे बहने तो,

उससे उठने वाली जल तरंगें,

तुम्‍हारे हृदय के खेत को,

हर भरा कर देंगी,

जो सूख रहा है,

बचा लो इस प्रेम को,

तोड़ दो मेरे जंग लगे दरवाजों को,

कहीं ऐसा न हो ये खुद टूट जाएं,

और जल प्रलय आ जाए,

और समस्‍त संसार ही,

प्रेमासिक्‍त हो जाए,

हे प्रिये तुम्‍हें याद है न

वो पहर।———-कुमार आदित्‍य

आम्रपाली…

मानक

यादों के दिये,

पलकों तले जलाकर रखे मैने,

आज सच में तुम्‍हारी याद आ रही है।

हर रोज तो तुम आती थी,

ऊषा की किरणों के साथ,

आशाओं के बरखा लिए,

बरसती थी झूमकर,

नाचती थी, गाती थी,

मस्‍ती में खिलखिलाती थी,

दिन की दोपहर में,

आम्रपाली के बाग में,

सुस्‍ताती थी उसी पेड़ के नीचे,

मोरनियों के नाच देखकर,

हमारे चेहरे खिल जाते थे,

जहां हम बचपन में कांचा खेला करते थे,

सावन के झूलों का गवाह वो पेड़,

आज नहीं है,

नही है वो बाग जहां हमने सदियां गुजरीं,

न ही है वो पेड़,

जिसके पत्‍तों से तुमने श्रृंगार किये थे,

रात होने को है,

तुम जा रही है,

अपने नए अशियाने में,

क्‍या तुम कभी नहीं आओगी।

अगली बार जब में एक बाग लगाऊंगा,

तो तुम जरूर आना,

शायद हम फिर से जी सकें,

सुकून के वो पल।———–कुमार आदित्‍य

गाया प्यार का गीत दुबारा…

मानक

है वसंत का मौसम प्‍यारा, सूरज का बढ़ गया है पारा,

बारिश की टिप-टिप बूदों ने, गाया प्‍यार का गीत दुबारा।।1।।

पेड़ों से गिरते पत्‍तों ने,

पुष्‍पों की खिलती कलियों ने,

हर मन है अगन लगाई,

जैसे जागी हो तरूणाई,

इस मौसम का खेल निराला, मैं भी फिरता हूं मतवारा,

बारिश की टिप-टिप बूदों ने, गाया प्‍यार का गीत दुबारा।।2।।

जब ठंडक जाने को होती,

प्‍यारा मौसम आता है,

धरती की धानी चुनरी पर,

नभमंडल इतराता है,

फागुन के गीतों की धुन पर, बाजे मन का हर इकतारा,

बारिश की टिप-टिप बूदों ने, गाया प्‍यार का गीत दुबारा।।3।।

यह मौसम यादों का मौसम,

जब भी मिलने आता है,

हर दिल में होती है हलचल,

हर युवा मन गाता है,

कामदेव के रथ सवार हो, चंदा को मिल गया है तारा,

बारिश की टिप-टिप बूदों ने, गाया प्‍यार का गीत दुबारा।।4।।

चल चलें सजाएं प्रीत ज़रा,

खोजें अपना मनमीत ज़रा,

प्रेम हिलोर उठे जब दिल में,

गाएं फिर मल्‍हार ज़रा,

इस मौसम में इस जीवन को, प्रियतम का यूं मिले सहारा,

बारिश की टिप-टिप बूदों ने, गाया प्‍यार का गीत दुबारा।।5।।

है वसंत का मौसम प्‍यारा, सूरज का बढ़ गया है पारा,

बारिश की टिप-टिप बूदों ने, गाया प्‍यार का गीत दुबारा।।6।।

————————————————-कुमार आदित्‍य

मां, ठंड और धूप …

मानक

सुबह की कड़कड़ाती ठंड के बाद,

धूप का आना,

वैसा ही लगता है,

जैसे वो कभी आती थी,

दबे पांव,

घूंघट ही ओट से,

अपनी बाहें फैलाकर,

मुस्‍कराते होठों और,

नैनों से इशारे करती थी,

मैं पागलों की तरह,

दौड़ पड़ता है,

उसका आलिंगन करने को,

उसके आगोश में,

भूला देता था खुद को,

उसकी सांसों की गर्मी,

मुझे जीवंत करती थी,

भूल जाता था मैं अपने,

सुख-दु:ख,

अभी तक तो मैं उदास था,

खोया था इस दुनिया के फेर में,

वो आई,

मुझे निकालने इस भंवर से,

वो न तो माशूका है,

न महबूबा,

न ही कोई दोस्‍त,

पर है कोई अजूबा,

आखिर कौन है वो ?

हमें अब भी याद हैं,

वो बचपन के दिन,

जब मेरी मां मुझे,

ठंड से बचाने को,

अपने आंचल में पनाह देती थी।

हाड़ कंपा देने वाली ठंड के बाद,

सुबह की धूप का एहसास भी,

मां सरीखा होता है।

सूरज के आते ही मैं भूल जाता,

इस ठंड में रात किस तरह काटी है,

इसलिए रोज इंतज़ार रहता है,

धूप के आने का,

मुझे मुक्ति देने के लिए।

———————-कुमार आदित्‍य