मिठास खो गई…..

मानक

time

 

 

 

 

 

 

ये जो दौर है उसके अपने कायदे
अपने कानून हैं,
हवाओं में बह रही हर बात,
शब्दश: सही होगी,
ये मुमकिन भी है, और नामुमकिन भी,
ये वक्त गहरी पड़ताल का है,
यहां बहुत सी दुकानें ऐसी हैं,
जिनकी उचाइयां तो बहुत हैं,
पर पकवान फीके ही मिलते हैं,
आजकल फीका जो पसंद करने लगे हैं,
मिठास का मज़ा अलग ही था,
पर कहीं खो गई मालूम पड़ती है।

न्यारा भारत…

मानक

स्वप्नों के साथ गुथे,

मेरे शब्द पंख लगाकर,

उड़ना चाहते हैं,

उत्तर के छोर से,

दक्षिण के छोर तक,

पूर्व से पश्चिम तक,

बिखरे हुए भारत को,

फिर जोड़ना के लिए,

जाग रही है मेरी आंखें,

कितना प्यारा था,

सुंदर और न्यारा था,

हमारा देश,

जहां का बचपना,

दूध की नदियों में नहाकर,

बड़ा होता था,

जिसकी जवानी,

लिखती थी,

शहादत की अमर गाथाएं,

जहां मां की कुर्बानियां,

वीरांगनाओं की कहानियां,

सुनकर,

फड़क उठती थीं भुजाएं,

ये सब कुछ,

खो सा गया,

न तो गाथाएं हैं,

न कहानियां,

न वीरांगनाएं,

न ही लिखी जाती हैं,

शहादत की अमर गाथाएं,

जकड़ गया है,

मेरा देश फिर से,

काले अंग्रेजों के चंगुल में,

ये सब अपने ही तो हैं,

पर न जाने क्यों,

कर रहे हैं अपनों पर अत्याचार,

इन्हें समझाओ,

मत करें गरीबों पर,

भ्रष्टाचार और महंगाई का जुर्म,

कहीं ऐसा न हो कि,

सोई हुई चिंगारी भड़क उठे,

जलाकर खाक कर दे,

अपनों को ही,

जुड़ा रहने थे भारत को,

बन जाने दें अखंड भारत।

मेरे शब्द कहीं बिखर गए,

पर एक स्वप्न पूरा हुआ,

शायद कल सुबह का भारत,

सबसे प्यारा हो,

सब देशों से न्यारा हो। —कुमार आदित्य