आखिर कब तक…

देखकर यूं भूख से मरते चमन को, रो उठा है आज फिर से  दिल कोई। धूं-धूं होकर जला रहा है घर किसी का, मर रहा है भूख से फिर आज कोई।।1।। रो रहा है फूल कोई पेट की इस आग में जल, इस हृदय में चुभ रहा है शूल कोई। मर रहे हैं अन्‍नदाता और…

हां खुद से अनशन करता हूं…

खुद से अनशन कर बैठा हूं, आखिर मैं चुप क्‍यों बैठा हूं ? दूर है मंजिल, राह कठिन है, फिर क्‍यों में थककर बैठा हूं ?   जन्‍म लिया था, चाल थी पकड़ी, संकल्‍प लिया था कुछ करने को, मन ही मन उठ रहे द्वंद थे, कुछ देकर जाऊंगा जग को, अब होता आभास यही…