भीड़…..

मानक

mob-mentality

भीड़ तो भीड़ ही होती है,
यही जाना था मैंने,
बचपन से लेकर आजतक, 
भीड़ की नहीं होती,
कोई जात—पात,
कोई वर्ण, कोई सम्प्रदाय,
धर्म इसलिए नहीं लिखूंगा,
क्योंकि मैने सीखा है,
धर्म जीवन पद्धति होती है,
हां अगर आप कहें,
भीड़ भी अपनाती है,
कोई जीवन पद्धति,
तो पहना सकता हूं मैं,
भीड़ को धर्म का मुल्लमा,
आजकल यही तो हो रहा है,
भीड़ को दिया जा रहा है,
धर्म, सम्प्रदाय, जाति
और वर्ण का नाम,
सेंकने को लिए रोटियां,
राजनीति की,
बढ़ाने को वोट बैंक,
भरमाने को देश के जरूरतों से,
ज्वलंत मुद्दों से,
वो नहीं देना चाहते जबाव,
किसी भी सवाल का,
इसमें कोई एक शामिल नहीं है,
हर किसी बनाया जा रहा,
हिस्सेदार और इसका शिकार,
एक ज़हर उतारा जा रहा है,
धीरे—धीरे, अहिस्ता, आहिस्ता,
हम सबकी नसों में,
जो बदल रहा है हमें,
एक अंधी बेपरवाह भीड़ में,
भीड़ तो भीड़ होती है,
पर आज उसका धर्म भी है,
वर्ण भी और जाति भी।——————————आदित्य शुक्ला