क्यों रे अमलतास

क्यों रे अमलतास,
निकल गई न,
तेरी सारी हेकड़ी,
कुछ रोज पहले तक,
बहुत गुमान था,
तुझे अपने वासंती यौवन पर,
तुझ पर ही तो छाया था,
अद्भुत वासंती रंग,
लोग तेरी सुंदरता देखकर,
अघाते नहीं थे,
काश! बरकरार रहती,
तेरी सुंदरता,
अब झड़ चुके हैं,
तेरे फूल और पत्ते,
तू तो ऐसा लग रहा है,
मानों हो शिकार,
भुखमरी का कई सालों से,
तेरे सूखे फल,
बयान कर रहे हैं कहानी,
कि पतझड़ ने,
तुझे भी नहीं छोड़ा,
खैर तू ही नहीं हर कोई,
झेलता है पतझड़ की मार,
जीवन भी तो,
कभी बचपन में हंसता है,
और कभी इसमें मचल उठता है,
वासंती यौवन,
और कभी औरों की राह ताकता
बुढ़ापा देख,
कांप जाती है रूह,
तेरा हाल भी वही हुआ,
अमलतास,
जो कल तक तुझे,
निहारा करते थे जी,
आज नहीं देखना चाहते तुझे,
पर इस पर रुदन मत करना,
फिर से वसंत आयेगा,
तू फिर से मचलेगा,
किसी और जनम में।———आदित्य शुक्ला
(सुबह-सुबह अमलतास के पेड़ को देखकर मन में उभरा संवाद, बन गया काव्य)
‘मैं ‘गांव’ हूं’

मैं ‘गांव’ हूं,
पर वक्त की मार से,
बदल रहा हूं हर पल,
पल-पल खो रहा हूं,
अपना अस्तित्व,
मेरी तालाबों पर,
बन गए हैं महल,
खेतों की हरियाली,
बन गई है कंकरीट,
अब कोई भी,
गर्मी की शांति को,
नहीं रोपता है,
बरगद, पाकड़ और पीपल,
शायद इसीलिए,
राहगीर इस और नहीं आते,
और न ही लगता है,
कोई प्याऊ,
प्यासा गला सींचने को,
मंदिरों में घंटीं की आवाज,
कम हो चली है,
वक्त कहां है अब,
पूजन-अर्चन का,
मैं बदल रहा हूं,
गौधूलि वेला में,
गायों के गले की घंटी,
अब नहीं बजती,
और न ही उठती है,
उनकी पदचाप से धूल,
हां अब इसकी जगह ले ली है,
उद्योगों से निकलने वाले,
धूएं और सायरन ने,
नित घुट रहा है,
मेरी संस्कृति का गला,
जिसे वर्षों संवारकर रखा मैंने,
अब बच्चे नहीं करते,
बड़ों का सम्मान,
भूल गए आदर सूचक शब्द,
गांव से निकलने वाली सड़क पर,
कान्वेंट जो बन गया है,
विकास की अंधी आंधी में,
उजड़ गए सैकड़ों घर,
बिखर गए परिवार,
एक ही घर में जलते हैं,
कई चुल्हे,
कंकरीट के घरों में रहने वालों के,
दिल भी पत्थर हो गए,
मैं गांव हूं,
कहां जा रहा हूं मुझे नहीं पता,
लोग इसे ही कहते हैं विकास,
पर मैं बदल रहा हूं,
हर पल, पल-पल।
(गांव से लौटकर मन में उभरी उथल-पुथल, सच में बदल रहा है गांव का परिदृश्य, अब गांव-गांव न रहे, न रहा जीने का वा हौसला)——————आदित्य शुक्ला
